
सुरेश परिहार, पुणे
महिदपुर रोड स्टेशन आज भले ही नई पुताई और रंग-रोगन के साथ एक साधारण-सा रेलवे स्टेशन दिखाई देता हो, लेकिन इसके पत्थरों में अब भी इतिहास की धड़कनें महसूस की जा सकती हैं. ब्रिटिश काल की भव्यता से निर्मित यह इमारत कभी दूर से ही अपनी पहचान बनाती थीऊँचे मेहराब, गहरी नींव और अनोखी बनावट वाली दीवारें. समय की धूल और बदली हुई रंगत ने इसकी चमक भले कम कर दी हो, पर स्टेशन की आत्मा आज भी हर पुराने यात्री के दिल में जिंदा है. एक जमाना था जब महिदपुर रोड स्टेशन सिर्फ यात्रियों के चढ़ने-उतरने की जगह नहीं था. यह पूरा कस्बे का सबसे बड़ा घूमने-टलने का ठिकाना था. लोग घर-दुकान की ऊब मिटाने स्टेशन पहुँच जाते थे. सुबह की ताज़ी हवा हो या शाम की हल्की ठंडक, प्लेटफॉर्म पर टहलने वालों का रेला लगा रहता था. आज भी यह परंपरा बदस्तूर जारी है.
स्टेशन मास्टर देवेनदास भाटिया सबके काका
उन दिनों रेलवे स्टेशन पर काम करने वाले लोग गाँव के सम्मानित चेहरे माने जाते थे. उनमें सबसे प्रमुख नाम था. स्टेशन मास्टर देवेनदास भाटिया, जिन्हें पूरा कस्बा प्रेम से काका कहता था. काका का व्यक्तित्व बड़ा अनोखा था, लगातार होंठों से चिपकी सिगरेट, मूडी स्वभाव और बच्चों के लिए एक रहस्यमय आकर्षण. कभी स्टेशन पर पहुँचो तो चॉकलेट दे देंगे, कभी पहाड़ा सुनाने को कहेंगे और कभी कविता. उत्तर न दे पाने पर दुलार-भरी एक चपत भी लगा देते पर कोई नाराज़ नहीं होता, सब जानते थे कि काका अपने तरीके से सबको सीख देते हैं.
कभी-कभी वे इतने सख्त हो जाते थे कि किसी को भी बिना काम स्टेशन में घुसने नहीं देते. लेकिन यह भी सच है कि काका की मौजूदगी स्टेशन का असली तापमान तय करती थीजहाँ वे खड़े होते, वहां स्टेशन जिंदा महसूस होता था.
उनके साथ ही मुल्कराज बाबू, लतीफ चाचा, लालाराम जी, और बुधाराम जी पोटर भी कस्बे के सम्मानित नाम थे.वे सिर्फ रेलवे कर्मचारी नहीं, महिदपुर रोड के सामाजिक धागे का अभिन्न हिस्सा थे.
सिर्फ चार ट्रेनें और स्टीम इंजन का दौर
उस समय स्टेशन पर केवल चार ट्रेनें रुका करती थीं. जनता एक्सप्रेस , देहरादून एक्सप्रेस, लोकल और पार्सल ट्रेन. हर ट्रेन स्टीम इंजन से चलती थी. कोयले की महक और इंजन की छुक-छुक उस समय की पहचान थी. प्लेटफॉर्म पर खड़ी ट्रेन को पोस्ट ऑफिस चौराहे से ही देखा जा सकता था. यह दृश्य आज के जमाने में सोचा भी नहीं जा सकता. जब ट्रेनें स्टेशन पर रुकती थीं, तो ड्राइवर और गार्ड चाय पीने शहर में निकल आते थे. यही वह दौर था जब स्टेशन के आसपास तीन दुकानें अपनी खास पहचान बनाए हुए थीं.
वो तीन दुकानें जिनका नाम ही गारंटी था
सौभाग्यमल जी पोरवाल (बड़ी होटल), यहाँ की चाय, सब्जीपूड़ी और मावाबाटी इतनी मशहूर थी कि लोग खास इसी के लिए स्टेशन उतरते थे. बड़ी होटल की खुशबू दूर तक जाती थी. इसके सामने ही शिवनारायण जी पोरवाल की दुकान जहां साफ-सफाई और स्वाद का अद्भुत मेल था रेलवे कर्मचारी तो जैसे इनके स्थायी ग्राहक थे. सेडूराम जी मीणा की दुकान 24 घंटे खुली रहती थी. रात के सन्नाटे में भी यहाँ चाय मिल जाती और यही बात इसे खास बनाती थी.
स्टेशन की बदलती परंपरा
समय बदल गया है, ट्रेनों की संख्या बढ़ गई है, रंग-रोगन नया हो गया है, लेकिन महिदपुर रोड स्टेशन की पुरानी यादें अब भी लोगों के दिलों में ताज़ा हैं. स्टेशन मास्टर देवेनदास भाटिया जैसे लोग अब भले उस प्लेटफॉर्म पर नजर न आते हों, पर उनकी कहानियाँ आज भी उसी तरह जिंदा हैं जैसे कभी उनकी सिगरेट का धुआँ प्लेटफॉर्म भर में तैरता था. यह स्टेशन सिर्फ यात्राओं का पड़ाव नहीं. यह महिदपुर रोड की संस्कृति, भावनाओं और यादों की जीवित डायरी है.
ऐसी सुखद यादें जीवन में सकारात्मकता को बनाए रखने के लिए रसद का काम करतीं हैं । बहुत बढ़िया संस्मरण है ।