दीवारें

पिंकी खुराना, प्रसिद्ध कहानीकार, चंडीगढ़

आज मुझे अपने घर की दीवारें बहुत अच्छी लग रही हैं. वो मुझे कह रही हैं. अभी थकना नहीं है, अभी बहुत काम बाकी है. सच ही तो कह रही हैं. मैं अभी थक नहीं सकती. परसों ही तो बेटे के घर से लौटकर आई हूं. कितना मान किया था बेटे ने मेरा. बहू ने भी कितनी इज्जत दी थी.नया घर बनवाया था, दूसरे शहर में. नौकरी भी तो उसी शहर में थी. फिर बहू का मायका भी वहीं था. तो फिर वह अपना घर मेरे शहर में क्यों बनवाता.बचपन से ही अपनी दीवारों की इच्छा थी. कोई भी दीवार सजाने की कोशिश करती तो मां कहती- “सब अपने घर जाकर करना”. शादी हुई तो सोचा था कि अपने तरीके से अपना घर सजाऊंगी, पर वह घर सास का था. एक चीज भी इधर-उधर नहीं कर सकती थी. राजन के पास इतना पैसा ही नहीं था कि वह अपना घर बनवा सके. उसके बाद बच्चों की जिम्मेदारियां पड़ गईं. फिर भला अपना घर क्या बनता. फिर भी बूंद-बूंद इकट्ठा कर रही थी, सागर बनाने के लिए.

जिस दिन नवीन पैदा हुआ, उसी दिन एक नए सपने ने भी जन्म लिया. नए घर का. पुरानी दीवारों से नफरत होने लगी थी. चाहे सारी उम्र वहीं गुजारी, पर वो दीवारें कभी अपनी नहीं लगीं. कभी-कभी लगता, वो दीवारें मुझसे पूछ रही हैं.”हमने तेरा क्या बिगाड़ा, क्यों हमसे इतनी नफरत”. समझ नहीं आता कि क्या जवाब दूं. क्या कहूं कि ये घर मेरा नहीं, किसी और का है.

तभी राजन की अचानक मौत ने मुझे हिला कर रख दिया. नवीन तब बहुत छोटा था. उसे बड़ा करने में सारी जमा-पूंजी खत्म हो गई. एक-एक कर सारे गहने भी बिक गए. ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थी, इसलिए जो छोटे-मोटे काम मिलते थे, कर लेती थी. पर एक ही जुनून था. उसे बड़ा आदमी बनाना है. और वह बन भी गया.

बहुत अच्छी कंपनी में नौकरी लग गई थी, लेकिन इसके लिए उसे दूसरे शहर जाना पड़ा. कलेजे पर पत्थर रखकर उसे भेज दिया. जब उसे पहली तनख्वाह मिली तो उसने मेरे नाम कितने पैसे मनीऑर्डर किए थे. “श्रवण कुमार है मेरा बेटा”-पूरे मोहल्ले में गाती फिर रही थी. मन गदगद हो गया था. सारा मोहल्ला कह रहा था-“बेटा हो तो ऐसा”. गर्व से सिर ऊंचा हो गया था.

लेकिन दूसरे महीने कोई मनीऑर्डर नहीं आया. पूछने पर झिझकते हुए बोला-“मां, आप ही तो कहती थीं घर बनवाना है, तो उसके लिए पैसे तो जोड़ने पड़ेंगे न”. सही तो कह रहा था. मैं भी न जाने क्या सोचने लगती हूं. मेरे लिए ही तो घर बना रहा है. मैं बहुत खुश थी कि मेरा बरसों का सपना पूरा होगा. कितना आज्ञाकारी बेटा, मेरी हर बात मानता है.

उसे नौकरी करते छह साल हो गए. शादी भी हो गई थी. उसने मुझसे पूछकर ही शादी की थी, चाहें लड़की उसकी पसंद की थी. उसके दफ्तर में ही काम करती थी. एक-दूसरे को पसंद करते थे. बस, मेरी मोहर लगनी थीसो लगा दी.

कितने साल बीत गए अकेले रहते. कभी कोई, तो कभी कोई बहाना लगा देता था. नवीन अपने साथ लेकर जाना ही नहीं चाहता था. कभी कहता-“मैं खुद एक कमरे के फ्लैट में रहता हूं, आप कैसे रहोगी”. कभी कहता-“आपका काम है यहां, आप मेरे पास कैसे आ सकती हैं”. लेकिन जब उसने घर बनाना शुरू किया तो मुझे पूरा विश्वास हो गया था कि अब मेरा वनवास खत्म हो जाएगा.

उसने बहुत सुंदर घर बनाया था. मुझे भी बुलाया था. बहुत बड़ा घर था. कितने कमरे थे. नवीन मेरा हाथ पकड़कर एक-एक कमरा दिखा रहा था-“मां, ये किचन है, ये मास्टर बेडरूम है, ये लॉबी है”. लेकिन मेरी आंखें तो कुछ और ही ढूंढ रही थीं. और वह पल भी आ ही गया-“मां, ये आपका कमरा है”. मैं बहुत खुश हो गई. “जब आना चाहो, दो–चार दिनों के लिए आना.”

मैं निरुत्तर थी. “बेटा, मेरी टिकट करवा दे. मेरा काम रुका हुआ है.” मन कर रहा था कि आज मेरा बेटा मेरी बात न माने, कह दे”यही रह जाओ मां”. परंतु आज्ञाकारी बेटे ने फिर मेरी बात मान ली. मेरी टिकट करवा दी.

मैं लौट आई अपनी दीवारों के पास, जो मुझे कह रही हैं-अभी थकना नहीं है.

18 thoughts on “दीवारें

  1. Bahut hi realistic heart touching story hai .pinky ji. Padte padte man bhaari ho gaya lekin woh jeevan ki sacchai hi hai. Apki Kahani lekhan par apko badhai ho ♥️

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