
मंजू शर्मा ‘मनस्विनी’
26 नवम्बर का दिन हमारे लोकतंत्र के इतिहास में विशेष महत्व रखता है। इसी दिन 1949 में भारतीय संविधान को अंगीकार किया गया था। किताबों में हमने पढ़ा कि यह संविधान हमें मौलिक अधिकार देता है. बोलने की स्वतंत्रता, जीने का अधिकार, धर्म मानने की आज़ादी, समानता का अधिकार और भी बहुत कुछ।
लेकिन जैसे-जैसे जीवन को समझा और समाज को करीब से जाना, महसूस हुआ कि किताबों और असल ज़िंदगी के बीच एक खाई है।
हम सभी को बचपन से सिखाया जाता है-“भारत एक स्वतंत्र देश है, यहां हर किसी को अपनी बात कहने का अधिकार है।”
लेकिन जैसे ही हम किसी संवेदनशील विषय, विशेषकर धर्म या राजनीति पर बोलते हैं, तुरंत आवाज मिलती है.“चुप रहो, यह मत कहो।”
अक्सर महसूस हुआ कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तो है, लेकिन इतनी शर्तों और सावधानियों के साथ कि असली स्वतंत्रता का अर्थ कमज़ोर पड़ जाता है।
संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, लेकिन उसी के साथ अनुच्छेद 19(2) में प्रतिबंधों की लंबी सूची भी जोड़ दी गई है. राज्य की सुरक्षा, नैतिकता, सदाचार, शांति, भाईचारा, न्यायपालिका की गरिमा आदि।
नतीजा यह कि आप बोल तो सकते हैं, लेकिन हमेशा एक अदृश्य डर के साथ। यानी अधिकार तो दिए गए, पर उनके साथ प्रतिबंधों की जंजीरें भी थमा दी गईं।
यह बात मुझे कई छोटे-छोटे अनुभवों से समझ आई। एक बार मैंने एक सभा में धर्म के नाम पर फैल रहे दिखावे पर सवाल उठाया था। मेरा उद्देश्य किसी की आस्था को ठेस पहुँचाना नहीं था, बल्कि सामाजिक समस्या की ओर ध्यान दिलाना था। लेकिन माहौल तुरंत बदल गया. लोग कहने लगे, “धर्म के बारे में मत बोलो, इससे विवाद हो जाएगा।”
उस दिन महसूस हुआ कि संविधान कहता है.धर्म मानने और प्रचार करने की स्वतंत्रता है, मगर व्यवहार में यह स्वतंत्रता आधी-अधूरी ही रह जाती है।
विचारों का भी यही हाल है। आप राजनीतिक नेताओं पर टिप्पणी करें तो समर्थक नाराज़ हो जाते हैं। किसी सामाजिक कुरीति पर बोलें, तो कहा जाता है. “समाज बिगड़ जाएगा।”
इस तरह की परिस्थितियों में स्वतंत्रता एक दिखावे जैसी लगती है.जैसे घर में माता-पिता कहते हैं, “तुम्हें अपनी पसंद का खाना खाने की आज़ादी है, पर यह मत खाना, वह मत खाना।”
आख़िर यह कैसी आज़ादी हुई, जिसमें हर कदम पर रोक-टोक साथ हो?
संविधान दिवस पर हमें इस महान ग्रंथ की आत्मा को समझना चाहिए। संविधान सिर्फ़ किताबों की शोभा बढ़ाने के लिए नहीं बना, बल्कि नागरिकों को सशक्त बनाने के लिए बना है।
लेकिन आज नागरिक अक्सर डर में जीते हैं. डर इस बात का कि सच बोलने पर उन पर मुकदमा हो सकता है, सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग हो सकती है, या समाज उन्हें अलग-थलग कर सकता है।
संविधान दिवस हमें यह सोचने का अवसर देता है. क्या हम केवल अधिकारों की सूची से संतुष्ट हैं, या हम उस स्थिति तक पहुंचना चाहते हैं, जहां हर नागरिक बिना डर, बिना दिखावे और बिना शर्त अपनी बात कह सके?
अधिकारों का अर्थ सिर्फ़ “मिल जाने” में नहीं, बल्कि “जी पाने” में है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, तो इसका इस्तेमाल इस तरह होना चाहिए कि न तो दूसरों की आस्था को ठेस पहुंचे और न ही सच दबे।
संविधान हमें सिखाता है कि अधिकार और कर्तव्य दोनों साथ चलते हैं। केवल अधिकार मांगना पर्याप्त नहीं है; हमें यह भी देखना होगा कि हमारे शब्द समाज में भाईचारा और एकता को नुक़सान न पहुंचाएं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि संविधान को एक जीवंत दस्तावेज़ की तरह जिया जाए। यह सिर्फ़ अदालत और संसद की चीज़ नहीं है, बल्कि हमारे रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा है। जब हम घर, दफ़्तर और समाज में बिना भय के अपनी बात रख सकें, तभी कह पाएंगे कि हमने सच में संविधान को अपनाया है।
हमें बोलने की आज़ादी का इस्तेमाल ज़िम्मेदारी के साथ करना चाहिए.ऐसा कि किसी की आस्था को ठेस न पहुंचे, लेकिन सच भी न दबे। यही संविधान की आत्मा है.अधिकार और कर्तव्य का संतुलन।
संविधान दिवस पर मेरा यही संदेश है
अधिकार हमें किताबों में पूरे मिले,
पर जीवन में आधे ही जी पाए।
अधिकारों के साथ जुड़े कर्तव्य
हमने अब तक कम ही निभाए।
अब समय है कि हम अपने अधिकारों को पूरी तरह जीना सीखें
और संविधान की आत्मा को व्यवहार में लाएँ।
Bahut sahi baat likhi aapne