मूक प्यार…

मंजूलता, प्रसिद्ध लेखिका, नोएडा

वो गरीब लड़की,
मैले-कुचैले कपड़ों में,
कीचड़ में खिलते कमल सी-
आँखों में अनगिनत सपने लिए,
फड़फड़ाते होठों से
कुछ कहना चाहती है,
पर कह नहीं पाती।

वो उसे रोज़ देखती है, निहारती है,
मन ही मन पूजती है।

वह भी उसे रोज़ देखता है-
असमंजस में रहता है,
सोचता है-वह मुझसे क्या चाहती है?

दिल थामकर एक दिन वह पूछ बैठता है-
“तुम्हें क्या चाहिए? पैसे?”
…ना में सिर हिलाना।

“कपड़े चाहिए?”
..फिर वही ‘ना’।

“खाना चाहिए?”
..अब भी ‘ना’।

“तो फिर क्या चाहिए?”

वह हथेलियों को कटोरी-सी गोल बनाकर,
ऊँगली से अपनी मांग भरते हुए इशारा करती है।

वह अवाक् रह जाता है।
यह कैसा प्रेम और कैसा प्रणय-निवेदन था
बिना संकेत, बिना संवाद के!

उलझन में डूबा वह कुछ सोच ही रहा था
कि पीछे से किसी ने कहा-
“इसकी बातों में मत आइए, साहब।
यह गूंगी और बहरी है।
इस दुनिया में इसका कोई नहीं है।”

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