मतलबी रिश्तों की चुभन

निरुपमा सिंह, प्रसिद्ध लेखिका, बिजनौर

हमने रिश्तों को दरकते देखा है,
धीरे-धीरे, बिना आवाज़ टूटते हुए
जैसे कोई काँच पर धूल बैठ जाए
और कोई ध्यान ही न दे
कि चमक कब गायब हो गई।

मतलबी रिश्ते
शुरू में बहुत मीठे लगते हैं,
उनकी बातों में अपनापन नहीं,
ज़रूरतें बसी होती हैं।

वे मुस्कुराते हैं
पर मुस्कान के पीछे लाभ टंगा होता है
वे साथ चलते हैं
पर साथ के पीछे सुविधा छिपी रहती है।

जब तक आप उनके काम आते हैं
वे आपके अपने हैं।
जिस दिन आपका उपयोग समाप्त
उनकी दूरी शुरू।

कितना अजीब है न?
कुछ लोग रिश्तों को नाव नहीं समझते,
सीढ़ियों की तरह इस्तेमाल करते हैं
एक-एक पायदान चढ़ते जाते हैं
और ऊपर पहुँचकर
उन्हें लात मारकर गिरा देते हैं।

पर जीवन का सत्य यही है
मतलबी रिश्ते तोड़ते हैं,
पर सिखाते भी हैं
हर मुस्कान संसार नहीं होती,
कुछ आँखों में लाभ की छाया भी होती है।

फिर भी…
विश्वास करना बंद मत करना,
बस आँखें खोलकर करना।
सच्चे लोग कम होते हैं,
पर वही जीवन के सबसे सुंदर किनारे होते हैं।

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