मन की उड़ान और उसकी बेड़ियाँ

रेखा हजारिका, असमिया लेखिका, लखीमपुर (आसाम)

बाँध कर रखो अपना मन
नहीं चाहिए कि वह उड़ जाए आकाश की ओर
नहीं चाहिए कि वह हँसकर आकाश को झकझोर दे

जब सुविधा मिले, वह उड़कर
सारे आकाश को छू ले
जब सुविधा मिले, वह सुनहरी धूप बन जाए
सारे हरे-भरे वन को छू ले
इसीलिए बाँध कर रखो
अपना मन

कितने सपने
कितनी लालसा
भूल गया क्या?
तुम्हें तो सपने देखने की मनाही है

जब सुविधा मिले, वह चांदनी रात की मदहोशी बन जाए
धाराओं को घेर ले
जब सुविधा मिले, वह शरद की रानी बन जाए
कंहुआ को खिलाकर ऊँचा उठाए

कितने रहन
कितने रंग
जब सुविधा मिले, वह लालिमा भरी धूप बन जाए
नदी के पानी में उतर जाए
जब सुविधा मिले, वह पर्वत की चोटियों पर चढ़ जाए
आशा के गीतों को जोड़ ले

बाँध कर रखो अपना मन
नहीं चाहिए कि वह उड़ जाए आकाश की ओर
नहीं चाहिए कि वह हँसकर आकाश को झकझोर दे 

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