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तीर्थ : आत्मा की यात्रा

शारदा कनोरिया शुभा, प्रसिद्ध लेखिका, पुणे (महाराष्ट्र)

पांच प्रायश्चित में तीर्थ का महत्वपूर्ण स्थान है। मनुष्य जब जीवन की भागदौड़ में थक जाता है, जब मन का संतुलन डगमगाने लगता है, तब भीतर से एक पुकार उठती है .चलो, कहीं आत्मा को शांत करें, या यूँ कहें, ईश्वर का सान्निध्य मिले, और यही पुकार मनुष्य को तीर्थ की ओर ले जाती है। तीर्थ केवल स्थान नहीं, वह आत्मा की यात्रा का आरंभ है।

भारत की धरती पर जितने तीर्थ हैं, उतनी ही आस्थाएँ। काशी के घाटों पर बहती आरती की लहरें, हरिद्वार की गंगा की कलकल, उज्जैन के महाकाल की आराधना, द्वारका में सागर की लहरों के साथ गूँजता “जय द्वारकाधीश”. यह सब केवल दर्शन नहीं, बल्कि अनुभूति हैं। हमारे पुरखों ने इन तीर्थों को केवल धार्मिक नहीं, सांस्कृतिक धरोहर के रूप में भी गढ़ा था। मुझे आज भी याद है, जब हम रामेश्वरम पहुँचे थे… दक्षिण का वह शांत सागर, जहाँ आकाश और जल एकाकार होते प्रतीत होते हैं। मंदिर के विशाल गलियारों में घंटियों की गूंज थी, हवा में नमक और भक्ति का मिलन। वहाँ के पत्थर जैसे प्राचीन कथा कह रहे थे .यहाँ स्वयं श्रीराम ने सेतु बाँधा था। यही वह स्थान है जहाँ भक्ति और कर्म का संगम हुआ था।

मंदिर के बाहर एक वृद्ध पंडितजी बैठे थे। मैंने उनसे बात करते हुए सहज ही पूछ लिया, “पंडितजी, हर कोई इन धामों की यात्रा क्यों करता है?”
वे मुस्कराए, आँखों में गहराई थी। बोले:
“बिटिया, हमारे पूर्वज ऋषि-मुनी कितने बुद्धिमान थे। उन्होंने केवल पूजा के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्र की एकता को जोड़ने के लिए चारों दिशाओं में चार धाम बनाए — उत्तर में बद्रीनाथ, दक्षिण में रामेश्वरम, पूर्व में जगन्नाथपुरी और पश्चिम में द्वारका।
सोचो, जब कोई व्यक्ति इन धामों की यात्रा करता है, तो वह सम्पूर्ण भारत की परिक्रमा करता है। यही है भारत विविधता में एकता का साक्षात रूप।”उनके शब्द सुनकर मन भीतर तक भीग गया। लगा जैसे तीर्थ केवल धर्म का नहीं, देश और संस्कृति का पुल हैं, जो मनुष्य को अपने भीतर और अपने देश से जोड़ते हैं।
रामेश्वरम से लौटते समय ट्रेन की खिड़की से सागर दूर तक फैला था। मन में एक गहरी शांति थी, जैसे किसी ने भीतर के शोर को धीरे से चुप करा दिया हो। समझ में आया कि तीर्थ जाना केवल किसी देवता के दर्शन करना नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर ईश्वर को देखना है।

गंगोत्री में हिम से निकलती गंगा, पुष्कर के सरोवर की शांति, काशी का आध्यात्मिक तेज और रामेश्वरम का नील सागर सब एक ही संदेश देते हैं: तीर्थ बाहर नहीं, भीतर है। तीर्थ वह स्थान है जहाँ हम अपने अहंकार को छोड़ते हैं, अपनी सीमाएँ पिघलाते हैं, और एक बड़े, पवित्र भाव से जुड़ जाते हैं। वहाँ पहुँचकर लगता है .ईश्वर कभी दूर नहीं था, हम ही अपने आप से दूर चले गए थे। यही तो तीर्थ का सार है. एक बाहरी यात्रा, जो हमें भीतर तक पहुँचा देती है।

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