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तीर्थ : आत्मा की यात्रा

तीर्थ केवल स्थान नहीं, बल्कि आत्मा की यात्रा है। जब जीवन की भागदौड़ में मन थक जाता है, तीर्थ हमें भीतर की शांति और ईश्वर के सान्निध्य की ओर ले जाता है। भारत के चार धाम बद्रीनाथ, रामेश्वरम, जगन्नाथपुरी और द्वारका सिर्फ धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और राष्ट्रीय एकता के प्रतीक हैं। तीर्थ यात्रा हमें अपने भीतर झाँकने, अहंकार छोड़ने और देश, संस्कृति व आत्मा से जुड़ने का अवसर देती है।

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एक प्रतीक्षा…

यह कविता जीवन में प्रतीक्षा की गहराई को उजागर करती है। इसमें मनुष्य के उस भाव को चित्रित किया गया है जहाँ वह प्रकृति या ईश्वर की अदृश्य उपस्थिति को महसूस करता है—एक ऐसा विश्वास जो जीवन को समेटता है, उसे संपूर्णता देता है। प्रतीक्षा केवल किसी घटना की नहीं, बल्कि उन सूक्ष्म संवेदनाओं, विरासत की प्रतिध्वनियों और जीने के अनगिनत रंगों की है। यह प्रतीक्षा जीवन की हर ध्वनि, रूप, पहचान और संबंध को आत्मसात करने की है, जिसमें प्रकृति और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का अंश समाहित हो। कविता कहती है कि सच्ची प्रतीक्षा वही है, जिसमें जीवन और ब्रह्मांड के साथ एकत्व का अहसास जुड़ा हो।

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