
मधु चौधरी, लेखिका, बोरीवली (मुंबई)
मैं नारी हूं,
गलतियां करती हूं,
पर उन्हें दोहराती नहीं।
हां, गलती से सबक सीखकर आगे बढ़ना जानती हूं।
सीमाओं में रहकर भी
सफलता को गले लगाना चाहती हूं।
अपनी लक्ष्मण रेखा स्वयं तय करती हूं,
उस रेखा को लांघकर अंदर कोई आ नहीं सकता,
कोई बहरूपिया मुझे रेखा पार ले जा नहीं सकता।
उन्नति के शिखर को छूना चाहती हूं,
पर अपने दायरों में रहकर।
कुचलकर किसी को आगे बढ़ना नहीं चाहती,
समझौता किसी तरह का करके झुकना नहीं चाहती।
सफलता न मिले, मंज़ूर है मुझे,
किरदार को अपना गिराना नहीं चाहती।
परिवार को बुरी नज़रें भी छू जाएं अगर,
*काली दुर्गा* बनने में देर नहीं लगाती।
ज़रूरत हो अगर, कंधे से कंधा मिलाने में नहीं कतराती।
दर्जा बराबरी का न मिले तो भी,
शान इससे मेरी घट नहीं जाती।
बहुत सामयिक लेख
अपनी रेखाएँ खुद ही बनानी चाहिए तभी अपनी सफलता प्राप्त की जा सकती है ।
बधाई ।
बिल्कुल सही कहा
Bahut sunder aur sahi
बहुत सुंदर प्रस्तुति
बहुत खूब..!!🙏🙏👌👌