
मधु चौधरी, लेखिका, बोरीवली, मुंबई
कितने अलग हैं हम,
फिर भी संग हैं हम।
तुम दिन हो,
तो मैं रात हूँ।
तुम शांत तट हो,
मैं बहता झरना हूँ।
तुम अडिग पर्वत हो,
मैं चंचल, बहती हवा हूँ।
तुम दिसंबर की धूप हो,
मैं बारिश की पहली फुहार हूँ।
तुम सावन हरे, न भादो सूखे,
मैं कभी सावन, तो कभी अकाल हूँ।
एक खूबसूरत डोर से बँधे हैं हम,
एक अनमोल बंधन में बँधे हैं हम।
कितने अलग हैं हम,
फिर भी संग हैं हम।

Heart touching
Ati sundar samarpit kavita
Bahut sundar
आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद, इसी तरह आपका स्नेह बना रहे
– सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वॉयर न्यूज, पुणे
Bahut badhiya
Hyderabad
Awwww … beautifully penned.
The differences make the journey more interesting ❤️and you and hum balance and complement each other. 🤗
जय हो
आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद, इसी तरह आपका स्नेह बना रहे
– सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वॉयर न्यूज, पुणे
अति सुन्दर रचना
थोड़े ही शब्दों में अपने हमसफ़र साथी का सारांश
बहुत खूब
इसे ही लिखते रहो
आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद, इसी तरह आपका स्नेह बना रहे
– सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वॉयर न्यूज, पुणे
बहुत सुंदर रचना
आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद, इसी तरह आपका स्नेह बना रहे
– सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वॉयर न्यूज, पुणे
आपकी लेखन कला बहुत ही शानदार है।
आप भावनाओं को शब्दों मे बहुत ही सुन्दर तरीके से व्यक्त करती है मधु जी।
आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद, इसी तरह आपका स्नेह बना रहे
– सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वॉयर न्यूज, पुणे
Very heart touching and the bond is so well explained in depth. As the proverb goes ‘opposites attract”
बहुत बढ़िया दिल छू लिया