
सुनीतासिंह, लेखिका, कोलकाता
गोधूलि बेला में समंदर का रेतीला तट सुनहली रश्मि किरणों से मायावी हो उठा है।
जल-उर्मियाँ हवा के तरंगों के साथ मिलकर कैसा खेल रच रही हैं! आतुर प्रणयी की तरह प्रचंड वेग से किनारे की ओर भागती हुई आती, और रेतीले तट को चूम, मदमस्त हवा के घोड़े पर सवार उठती-गिरती, अपने उद्गम स्थल को लौटती।
किनारे से थोड़ी दूर पथरीले टीले पर बैठी मैं, मंत्रमुग्ध लहरों की बेचैन आवाजाही में खोई जा रही थी। पहली बार समंदर को इतने करीब से देख रही थी।
टीले के दूसरी ओर, तुम और मैं — पहले मुलाकात भर की दूरी पसरी हुई थी।
तुम्हारी नज़रों का उतार-चढ़ाव क्या इन लहरों से कुछ कम था!
हवा के तेज़ झोंके, अमलतासी रंग की कमीज़ पर पड़े गहरे नीले बंधेज दुपट्टे को — जिस पर मानो किसी ने अमलतास और जूही की पंखुड़ियाँ बिखेर दी हों — अस्तव्यस्त कर देते। उसे संभालने के क्रम में नजरें तुम्हारे तरफ़ मुड़ी।
तुम्हारी नजरें, जो अब भी मेरी बालों में खोए बेली के गजरे से उलझे झुमके पर अटकी पड़ी थीं, झेंप सी गई।
“तुम्हारा झुमका कितना सुंदर है।”
“बेली के गजरे से भला क्या सुंदर होगा,” मैंने बात पलटने की कोशिश की।
“हाँ… झुमके से सुंदर बेली का गजरा और…” जान-बूझकर तुमने शब्दों को अधूरा छोड़ दिया।
नज़रें उठीं — “और?”
“उससे भी सुंदर तुम।”
मेरे गालों की तपिश बढ़ गई। हम बहुत थोड़ी देर के लिए एक-दूसरे की आँखों में ठहरे रहे, फिर मानो हड़बड़ाते हुए समंदर की और मूड गए।
हवा के तेज़ झोंके, अलकों के गुच्छे मुँह पर बिखेर-बिखेर जाते; उन्हें समेट कानों के पीछे ले जाकर खोंसने के क्रम में पुनः बेली का गजरा झुमके के रूपहले मोतियों में उलझ जाता।
तुमने हौले से कहा, “रहने दो उन्हें उलझा, हवा की शरारत रुकते ही सुलझ जाएंगे। मुझे तो जलन हो रही है बेली के गजरे और झुमके पर।” तुम्हारा लहज़ा शरारती हो रहा था।
“देखो, कैसे बार-बार तुम्हारे गालों को छू रहे हैं।”
“धत! आप भी…” ये चारों तरफ गुलमोहर कैसे खिल उठे! समंदर और गुलमोहर? मैं भी न!
“सुनिए, आप समंदर देखिए न।”
“झुमके और बेली कहाँ जाते हैं, मेरे गाल दहक रहे हैं।”
शरारत से मुस्कुराते हुए, “हाँ! मैं भी वही सोच रहा था, समंदर के किनारे पलाश कहाँ से दहक उठें।”
गुलमोहर, पलाश और समंदर… अब क्या!
पलकें यूँ बोझिल हुई जा रही थीं।
मुझे असहज होते देख तुमने समंदर की तरफ़ मुड़ते हुए कहा, “देखो, सूरज समंदर में कैसे घुल रहा है।”
लहरों की तरफ़ मुड़ते हुए मेरी नजरें न जाने कैसे तुम्हारी ठोड़ी के गड्ढे पर अटक गई।
“उफ! ऐसा भँवर तो समंदर के पास भी न होगा।” मन गोल-गोल चक्कर काटता हुआ भँवर के अंदर और अंदर…
एक पल की तो बात थी, वह भी तुम्हारी नज़र से न बची। होंठों पर अर्थपूर्ण मुस्कान लिए तुम्हारी आँखें पूछ रही थीं, मानो अब मुझे क्या हुआ जा रहा है।
लहरें हम तक आते-आते हल्की हो जातीं; उनका फेनिल स्पर्श हम दोनों के पैरों को हल्का सा भिगोते हुए लौट जाता। लहरों का रंग कैसा मायावी हो रहा था!
“सुनिए, मुझे समंदर के थोड़ा और करीब जाना है।”
“पर तुमने तंग चूड़ीदार पहन रखा है, भीगी रहोगी तो देर तक ठंड लग जाएगी।”
“समंदर के इतने पास आकर भीगे नहीं तो क्या किया?”
मेरे अनुरोध को ठुकरा न पाने की मनचाही बेबसी तुम्हारे चेहरे पर खिल उठी। शायद तुम भी भींगना चाहते थे।
दोनों साथ-साथ उठे। तुमने अपना हाथ बढ़ाया; थोड़ी सी झिझक के साथ मैंने अपनी उंगलियाँ तुम्हारी हथेली पर रखी। दूसरे ही पल मेरी उंगलियाँ तुम्हारे उंगलियों के नर्म आगोश में सिमट गईं। प्रथम स्पर्श की ऊष्मा तरंगित हो दो शांत चेहरों पर रक्ताभ कूची फेर रही थी।
चार कदमों में समंदर की रेतीली दूरी नाप ली।
रेत का गीलापन कदमों को भारी कर रहा था। सूरज पिघल-पिघल कर समंदर में टपक, अथाह जलराशि का सुनहला मायावी संसार रच रहा था।
चलते-चलते अब हम समंदर के बहुत करीब थे; तभी तेज़ लहरें सैलाब की तरह उमड़ती आईं।
मेरे कदम ठिठक गए। “सुनिए, कितनी तेज़ लहरें हैं, मैं संभल न पाई तो?”
तुमने एक गहरी मुस्कुराहट के साथ कहा, “अपनी हथेली पर मेरी उंगलियों की कसावट को महसूस करो।”
तभी फेनिल लहरों के एक तेज़ झोंके ने दो आकृतियों को सरोबर करते हुए एकाकार कर दिया।
रूमानी और अहसास को महसूस कराती रचना। पढ़ते समय आंखों के आगे एक चित्र बनाने का कमाल आपकी कलम ने कर दिखाया।
धन्यवाद 😊 🙏
अच्छी रचना हेतु साधुवाद।