
डॉ. उर्मिला सिन्हा, प्रसिद्ध लेखिका, रांची (झारखंड)
बरसात में निरंतर पानी का बरसना। घर के आस-पास, ताल-तलैया, नाहर-पोखर, यहाँ तक कि फुलवारी के अगल-बगल भी पानी ही पानी।
बीच में पगडंडी रास्ता सूझता न था। हथिया नक्षत्र में इन्द्र देव की विशेष कृपा रहती… पानी भी बरसता दिल खोलकर। लाल चाचा के अनुसार, “हथिया नक्षत्र अर्थात—हाथी के चार पैर… पहला बरसा, दूसरा बरसा, तीसरा बरसा और चौथे में… लबालब।”
गाँव के एक स्थान से दूसरे को जोड़ने वाली पगडंडी पूर्णतः डूबी हुई रहती थी। उसे पार करने वाले के एक हाथ में चरणपादुका, दूसरे से घुटनों तक कपड़ा उठाए… बड़ी एहतियात से फूँक-फूँक कर पार करते। ज़रा भी चूके कि छपाक से गड्ढे में गिर जाते—सत्यानाश! बच्चों का क्या, वे तो ताली बजाने और खिलखिलाने में मस्त रहते।
क्वार का महीना आते ही चारों ओर पानी ही पानी हिलोरें मारता। करमी का साग गरीबों का आहार, एक अजब सी सीलन भरी महक फिज़ा में फैली रहती। धान के पौधों में दाने अंकुरित होने लगते।
उसी बीच पदार्पण होता था चिर-प्रतीक्षित शारदीय नवरात्र का… जय हो दुर्गा माई! वातावरण भक्तिमय हो उठता। बड़ों के साथ हम बच्चे भी बड़ी श्रद्धा से सिर नवाते। मौसम में बदलाव होने लगता था, हल्की-हल्की ठंड का अहसास होता, सिहरन सी होती।
गाँव का पैतृक घर खुला-खुला, चारों ओर पानी ही पानी… खुले आकाश में सूरज-चंदा का उगना-डूबना।
धूप इतनी तेज कि माँ कहती—
“इसी कुआर के घाम में चमड़ा सुखाया जाता है।”
हम बच्चे “आयं” कहकर अपने खेल में मस्त हो जाते।
दुर्गा पूजा में स्कूल की छुट्टियों का इंतज़ार रहता था। पंचमी या षष्ठी से स्कूल बंद हो जाता। घर में कलश स्थापना की प्रसन्नता छाई रहती अलग। घर के बड़े-बुजुर्ग नौ दिनों तक विधि-विधान से फलाहार रहकर माता की आराधना करते। धूप-दीप-अगरबत्ती की सुगंध से वातावरण सुवासित रहता।
संध्या आरती में हम बच्चों को भी प्रवेश मिलता। हम बड़ों के सुर में सुर मिला जोर-जोर से आरती गाते—”जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।” किसी के हाथ में झाल, कोई ढोल-मंजीरा, कोई घंटी बजाता, कोई शंख फूँकता… हम बच्चे बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते। बदले में हमें स्वादिष्ट प्रसाद मिलता।
संयुक्त परिवार था। छुट्टियों में चाचा, बुआ, भैया, दीदी सपरिवार आते। हम बच्चों का कुनबा मज़बूत होता। उधम मचाने-धमाचौकड़ी में सबसे आगे रहते हम बच्चे।
घर के बड़े पूजा-पाठ, खरीदारी, घर-बाहर की समस्याओं में व्यस्त… हमें डाँट-फटकार ना के बराबर मिलती और हमारे तो पौ-बारह! तरह-तरह के पकवान… केले के पत्ते पर सामूहिक भोजन, नाश्ता-पानी, खेल-कूद, नये रंग-बिरंगे कपड़े और खिलौने मिलते।
हरसिंगार का फूल रातभर झर-झर गिरता। सबेरे हम बच्चे डलिया भर-भर चुनते, उसी से माता रानी की पूजा होती।
हमारा मुख्य आकर्षण था गाँव में तीन दिनों तक लगने वाला मेला—सप्तमी, अष्टमी और नवमी। गाँव के पढ़े-लिखे नौजवान सामाजिक, पौराणिक, सुरुचिपूर्ण और रोचक नाटकों का मंचन करते। जादू का खेल, कठपुतली का मनभावन नाच, बायस्कोप और तरह-तरह के स्वाँग रचे जाते।
उन दिनों मनोरंजन के नाम पर एक रेडियो था, वह भी किसी-किसी के यहाँ। प्रसारण अवधि सीमित थी। ग्रामीण हमारे दालान में दादाजी के पास समाचार सुनने आते। “ग्रामीणों का कार्यक्रम”, चौपाल, नाटक, प्रहसन नियमित रूप से सामूहिक श्रवण करते।
गाँव में दो टोला था—बड़का टोला और छोटका टोला। दोनों जगह माँ दुर्गा की मूर्ति रखी जाती थी। मेला लगता, नाटक खेला जाता। मीलों दूर से ग्रामीण हाथों में लालटेन, टॉर्च, बैठने के लिए बोरा-चादर लेकर सपरिवार नाटक देखने आते।
दशहरा मेले का इंतज़ार पूरे गाँव, विशेषकर महिलाओं और बच्चों को सालभर रहता था। यही वह समय होता जब वे घर से बाहर निकल बाहरी दुनिया देखते, खरीदारी करते। मेले की नौटंकी, रामलीला, जादू का खेल… दिवाली के लिए बंदूक, पटाखे, गुब्बारे, खिलौने, ज़रूरत की वस्तुएँ खरीदना उनका मुख्य आकर्षण होता। महिलाएँ रंगीन काँच की चूड़ियाँ, चमकीली बिंदिया, शीशा, फीता, कलकतिया सिंदूर, आलता—अलाय-बलाय शौक का सामान अपनी रुचि और सामर्थ्य अनुसार खरीदारी करतीं।
हमारे बाबा हम बच्चों को एक पंक्ति में खड़ा कर सभी के हाथ में आशीर्वाद स्वरूप रुपये देते—”जो मन चाहे खरीदो।” कोई रोक-टोक, पाबंदी या हस्तक्षेप नहीं।
गाँव का मेला था—एक शिष्टता, अनुशासन और अपनापन रूपी नियमावली। किसी के साथ न कोई बदतमीज़ी, न अप्रिय घटना कभी देखने-सुनने को मिलती।
आज सोचती हूँ, बाबा कितने दूरदर्शी थे! हमें स्वावलंबन, अपना निर्णय स्वयं लेने का और प्रबंधन का गुर बातों-बातों में सिखा गए मेले में खरीदारी के बहाने।
सप्तमी, अष्टमी, नवमी को नए परिधान में सज-धज कर बड़ों के साथ मेला देखने जाते, हमारी खुशी का ठिकाना न रहता। देवी दुर्गा माता का दर्शन करते। मेले में गाजा, खाजा, लड्डू, बताशा, रसगुल्ला, नमकीन खरीदे जाते।
रंग-बिरंगी, खट्टी-मीठी गोलियाँ—जिसकी जैसी चाहत।
जैसे ही नाटक का परदा उठता, “धिन्न… धिन्नक… धिन्न…” बाजा बजाने वाले का तामझाम और कलाकारी हमें उसमें खो देती।
कलाकारों का हाथ जोड़कर—
“जय जय गिरिराज किशोरी
जय महेश मुखचंद चकोरी”
से शुरुआत होती। फिर नाटक। अनगढ़ कलाकार, विचित्र वेशभूषा, स्वयंभू गायक जो समां बाँधते थे। वह आज की बनावटी दुनिया में असंभव है।
हमारा रोम-रोम पुलकित हो जाता। हम कलाकारों के साथ हँसते-रोते, तालियाँ बजाते। दोनों टोले के नाटकों की प्रस्तुति की तुलना करते।
ढाक-वादन, बड़े-बड़े मिट्टी के जलते दीयों के साथ भक्तों का हुंकार-नृत्य… “महिषासुर मर्दिनी” के सर्वशक्तिमान होने का एहसास कराता।
जब वापस लौटते तो रात्रिकालीन तीसरा प्रहर बीत चुका होता।
पूरे दिन हम उछल-उछल कर मेले में खरीदी गई पूपूही बांसुरी बजाते। मेले से लाए खिलौनों से खेलते, रूठते-मानते।
सप्तमी, अष्टमी, नवमी—भक्तिमय, उल्लासपूर्ण, पवित्र वातावरण में हम सराबोर होते रहते।
दशमी के दिन नए कपड़े धारण कर बड़ों का चरणस्पर्श कर उनसे आशीर्वाद पाते। कोई कपड़ा, कोई खिलौना और कोई रुपये देता। उस दिन माँ दुर्गा का विसर्जन गाँव के बड़े तालाब में होता। उसमें सुरक्षा के लिहाज़ से बच्चों का भीड़-भाड़ में जाना वर्जित था।
पवनी-पसारी बख्शीश पाकर दाता का आभार मानते। दुर्गा माई का जय-जयकार करते।
सुहागिनें सिंदूर-खेला मना अपने अखंड सौभाग्य की माँ से कामना करतीं।
घर का कलश-विसर्जन होता। एक तिलिस्म जो हमारी आँखों के सामने होता, उसका यूँ ढह जाना हमें बच्चों को मर्माहत कर देता। हम उदास हो उठते।
विजयादशमी को नीलकंठ पंछी का दर्शन अति-शुभ माना जाता। हम बच्चों को कहीं न कहीं धान के खेत में या पेड़ों की टहनियों पर नज़र आ ही जाता। हम बच्चे बड़ों का ध्यान आकर्षित करने के लिए शोर मचाते। उधर नीलकंठ चिरैया—फुर्र!
जैसे ही पंडितजी मूर्ति-भसान के पश्चात अपने हाथों में जई का मुट्ठा हमें आशीर्वाद स्वरूप देते, कोई उसे अपने कानों में खोंसता, कोई जनेऊ में। हम अपने पाठ्यपुस्तकों में जई छुपाकर रख देते, इस आस में कि हमें सहजता से सब कुछ याद हो जाएगा। क्योंकि उन दिनों वार्षिक परीक्षा दिसंबर महीने में होती थी।
इस प्रकार दशहरा का समापन धूमधाम से होता। हम हाथ जोड़ शीश नवाते—
“अगले बरस तू जल्दी आ, माँ।”
Nice