सूरज की पहली किरण

रेणु परसरामपुरिया, लेखिका, मुंबई

आधी रात को फोन की घंटी बजी। आवाज़ से विमल की आंख खुली। गहरी नींद सोए हुए तो एक जमाना बीत गया था। एक घंटी बजते ही आंख खुल गई।

— “हेलो… हां… अच्छा…”

बस इससे ज्यादा विमल कुछ कह ही नहीं पाए। फटाफट चश्मा लगाया और बगल के कमरे में सोई हुई अपनी छोटी बेटी नताशा की तरफ भागे। उसे जल्दी से उठाया। फोन पर मिली समाचार दी गई। सहसा नींद से जागने और ऐसी खबर मिलने पर उससे भी कुछ कहते नहीं बना। सिर्फ इतना ही पूछ पाई—

“क्या सच में, पापा?”

विमल ने कुछ जवाब न दिया। बस इतना कहा—
“जल्दी करो।”

दोनों घर बंद कर बाहर आए एवं लिफ्ट का इंतजार करने लगे।

लिफ्ट में शांति थी। कार की तरफ बढ़ते हुए नताशा ने विमल से कहा—
“पापा, कार की चाबी… आप नहीं चला पाओगे।”

विमल ने बिना किसी प्रतिकार के चाबियां नताशा को दे दी। कोई और समय होता तो शायद इतनी आसानी से न देते। जानते थे कि इस खबर को सुनने के बाद शायद ड्राइविंग ठीक से न कर पाए। पूरे रास्ते दोनों ने आपस में कोई बातचीत नहीं की। सिर्फ विमल ने अपनी बड़ी बेटी अदिति को फोन कर खबर दे दी। अदिति उसी शहर में अपने पति एवं एक साल की बेटी के साथ रहती थी।

कुछ ही देर में सभी लोग लगभग एक ही साथ अस्पताल पहुंच गए। सभी के कदम अस्पताल की पहली मंजिल की तरफ बढ़ने लगे। सभी के मन में बैचेनी, व्याकुलता, चिंता, डर, व्यग्रता—इतनी सारी भावनाओं की लहरें सुनामी ला रही थीं कि किसी से कुछ कहते ही नहीं बन पा रहा था। सभी इस डर से खामोश थे कि कहीं ये सैलाब आंखों के रास्ते किसी दूसरे के दिल में घुसकर उसके मजबूती से जकड़े हुए भावनात्मक रूपी घर की नींव को न हिला दे।

जैसे ही वे लोग कमरे के बाहर पहुंचे, नर्स ने दरवाजा खोला और अंदर आने का इशारा किया।

बिस्तर पर मंगला लेटी हुई थी, आंखें बंद। विमल धीरे से पत्नी के पास गए। उन्होंने पत्नी के माथे पर हाथ फेरा। मंगला ने अपने पति के हाथों का स्पर्श पाते ही धीरे-धीरे अपनी आंखें खोलीं। सबसे पहले मंगला की नजर अपने पति पर गई और आंख के कोने से आंसू की एक छोटी बूंद फिसल गई तकिए पर। पति ने मुस्कुरा कर मंगला का स्वागत किया—दुबारा जन्म लेने पर।

“जी हां… दूसरा जन्म!”

मंगला ने सामने देखा उनकी छोटी बेटी नताशा को। जो सैलाब उसने अपने अंदर समेट रखा था, वो अब बह चला था। उसी के पास खड़ी थी अदिति, गोद में छोटे बच्चे के साथ, और साथ में थे आदर्श।

मंगला कुछ समझ न पाई। उसने नज़रें घुमा कर पति की तरफ देखा। विमल मंगला के दिल की बात समझ गए। उन्होंने बताया—
“ये अदिति के पति आदर्श हैं और साथ में हैं उनकी नाती राशा, जिसकी शक्ल बिल्कुल अपनी नानी पर थी।”

यह सुनकर मंगला अचंभित थी।

विमल ने कहना शुरू किया—
“पांच साल पहले तुम्हारे एक्सीडेंट के बाद तुम कोमा में चली गई थीं। डॉक्टर ने बहुत कोशिश की, पर वे भी कुछ नहीं कर पाए। मुझे विश्वास था कि तुम कोमा से बाहर आओगी। मुझे तुम्हारे भगवान पर भरोसा था। मैं तुम्हारा संसार तुम्हें वापस लौटाना चाहता था। मैंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की अपनी गृहस्थी संभाल कर रखने की, ताकि जब तुम आंखें खोलो, मुझसे कोई शिकायत न करो। इसमें तुम्हारी बेटियों ने मेरा बड़ा साथ दिया। चलो, तुम्हें मिलवाता हूँ तुम्हारे दामाद से—ये हैं आदर्श। बिल्कुल अपने नाम की तरह ही हैं।”

यह सुनकर आदर्श हल्का सा मुस्कुराए और झुककर अपनी सासू मां को प्रणाम किया।

विमल आगे बोले—
“और ये हैं तुम्हारी नटखट नाती राशा। पता है आज इसका पहला जन्मदिन है, तो हम नानी और नाती का जन्मदिन एक साथ मनाएंगे। जानती हो, मंगला, नताशा ने अपनी पढ़ाई पूरी कर ली है और एक बहुत बड़ी कंपनी में नौकरी कर रही हैं। ये नताशा जो तुमसे पूछे बिना एक कदम भी नहीं चलती थी, आज अपने डिपार्टमेंट की हेड हैं। मंगला, तुम्हारे बिना मुझे मुश्किल तो बहुत हुई, पर इन बच्चों ने मेरा बहुत साथ दिया। सच में तुमने बहुत अच्छे संस्कार दिए थे, मैं अकेला तो सब संभाल ही नहीं पाता।

तुम अदिति की शादी को लेकर अचंभित होगी। वह भी शादी के लिए तैयार नहीं थी। वह तुम्हें इस हालत में छोड़कर शादी नहीं करना चाहती थी। तुम ही कहा करती थीं ना—ज़िंदगी कदम दर कदम आगे बढ़ती रहनी चाहिए, चाहे जितनी भी मुश्किलों का सामना करना पड़े। बस यही बात मैंने अदिति को समझाई। तीन साल हो गए हैं इनकी शादी को।

मंगला, मैं कभी तुम्हारी जगह तो नहीं ले सकता। न लेना चाहता हूँ। मैंने पूरी कोशिश की अपनी जिम्मेदारी निभाने की।”

मंगला बहुत ज्यादा सोच-विचार करने की स्थिति में नहीं थी। अपने परिवार को सामने देखकर संतुष्ट थी। उसे ऐसा आभास हो रहा था जैसे पिछले पांच सालों की नींद से जागने के बाद वह कोई बहुत ही सुंदर सपना देख रही हो। सूरज की पहली किरण उस सपने में चार चांद लगा रही थी।

6 thoughts on “सूरज की पहली किरण

    1. एक निवेदन
      रचनाओं पर प्रतिक्रिया देने के लिए आपका धन्यवाद, यह अवश्य हमारे साथियों का उत्साहवर्धन करेगी और नवसृजन के लिए प्रेरित करेगी. बस एक छोटा सा निवेदन है आप सभी से कि आप अपने शहर का भी उल्लेख कर देंगे तो हमें और हमारे साथियों को लगेगा की उनकी रचनाएं कहां-कहां तक पढ़ी जा रही है.
      आपका साथी

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