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सूरज की पहली किरण

रेणु परसरामपुरिया, लेखिका, मुंबई आधी रात को फोन की घंटी बजी। आवाज़ से विमल की आंख खुली। गहरी नींद सोए हुए तो एक जमाना बीत गया था। एक घंटी बजते ही आंख खुल गई। — “हेलो… हां… अच्छा…” बस इससे ज्यादा विमल कुछ कह ही नहीं पाए। फटाफट चश्मा लगाया और बगल के कमरे में…

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