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हिंदी दिवस: मातृभाषा की मौन पीड़ा

hindi divas

माधुरी द्विवेदी, प्रसिद्ध लेखिका, कानपुर

हिंदी तुम बिंदी बन कर
मेरी कविता के भाल सजी!

हर प्रसंग में तुम हरदम मेरे साथ रहीं,
अपनी सहज-सरल भाषा से
मेरे गीतों में ढली।
हर भाव में पारिजात-सी तुम
मेरी कविता में झरी…

मन तुम्हारे भावों को समेट रहा होता,
तभी सहसा अंग्रेज़ी बेड़ियों की खनक से
तन्द्रा टूटती है…

Congratulations मधु! आज हिंदी दिवस है।

हमने कहा — सखी! आपको भी हिंदी दिवस की बहुत शुभकामनाएँ।
और मन ही मन हँस पड़ी — हुंह… हिंदी दिवस!
अब कहती भी तो क्या?
भीतर दिल रो रहा था,
ये दुर्दशा मातृभाषा की!

देश ग़ुलामी से आज़ाद हुआ,
भाषा आज भी ग़ुलाम है।
शायद वक़्त हमसे कोई चाल
चल गया…
अंग्रेज़ों से आज़ादी और
अंग्रेज़ी का ग़ुलाम कर गया!

“हिंदी” मस्तक की अट्टालिका से
औंधे मुँह आ गिरती है…

विचारों का झंझावात,
युद्धस्थ अंतर्मन
चीत्कार उठता है…

बे-अथाह, दुरूह परिश्रम से मिली हिंद को आज़ादी,
आज हिंदी का तिरस्कार —
कैसी है ये बर्बादी???

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