– डॉ. हरीशकुमार सिंह
अपने यहाँ सबसे सस्ती चीज नमक मानी गई है। पर रुकिए, सबसे सस्ती चीज नमक नहीं है, बल्कि अपने यहाँ सबसे सस्ती चीज है आम आदमी की जान।
असल में आम आदमी कहीं भी, कैसे भी मर सकता है; मार दिया जाता है या व्यवस्था की लापरवाही उसे मार डालती है और अगले दिन सब भुला दिया जाता है। आम आदमी की जान इतनी सस्ती है कि रहनुमाओं को कोई फर्क ही नहीं पड़ता।
मंदिरों में पर्वों पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है और अफरातफरी से, रेल दुर्घटनाओं से, पुल गिर जाने से, बनती इमारत ढह जाने से, स्टेडियम में दर्शकों की भीड़ में मारामारी से, रेलवे स्टेशन पर कुचलने से, मेलों-ठेलों में दबने से, घंटों जाम लगने से आम आदमी की जान चली जाती है। आम आदमी की जान, जान नहीं बल्कि मामूली सी चीज है। टेंशन क्या लेना, रोज ही तो मरते हैं।
व्यवस्था न भी मारे तो आपस में लड़कर मर जाते हैं, ज़मीन-जायदाद के झगड़ों में मारे जाते हैं, रंजिश में कत्ल हो जाता है, ऑनर किलिंग हो जाती है। सरकार, प्रशासन, पुलिस कहाँ-कहाँ ध्यान दे? आखिर आम आदमी की जान ही तो है। आम आदमी की जान है, तो फिर जान ‘आम’ ही तो रहेगी, ‘खास’ तो होगी नहीं।
आम आदमी की जान की चिंता किसी को नहीं रहती, इसलिए उसकी सुरक्षा के उपाय कौन करे और क्यों करे? लंबी कांवड़ यात्रा में अव्यवस्था फैलने से या प्रवचन के बाद भगदड़ से भी जान जा सकती है। हमेशा की तरह आयोजक बरी, कोई एफआईआर नहीं, कोई जाँच नहीं। आज आम आदमी की जान थोक में गई है, गई तो गई। शोक व्यक्त करने के लिए सोशल मीडिया है, जिससे लगता है कि संवेदनाएँ अभी पूरी तरह मरी नहीं हैं, आँखों में थोड़ी शर्म बची है, मगर चिंता की बात नहीं। बेशर्मी से कहा जा सकता है कि जो धरती पर आया है उसे जाना ही है, बस थोड़ा जल्दी चला गया।
अगली बार फिर वही भीड़ देश में कहीं भी, फिर भगदड़ और फिर आम आदमी की जान चली जाएगी। फिर कड़े उपाय और व्यवस्था सुधारने की बातें होंगी, मगर फिर वही ढर्रा चलता रहेगा। सिलसिला रुकता नहीं क्योंकि आम आदमी है, उसका क्या हिसाब रखना। अस्सी मरें, आठ बताओ, क्या करना है? कौन पूछने वाला है?
पहले मीडिया आम जनता को बताता था कि यह असलियत है। अब मीडिया कुछ भी बताए, आम आदमी बिल्कुल विश्वास नहीं करता। मीडिया आठ बताता है, आम आदमी खुद ही दस गुना समझ लेता है। अब तो आम आदमी मीडिया की मजबूरी भी समझता है और मीडिया के लिए भी आम आदमी की जान, बेजान ही है।
आम आदमी की जान इतनी सस्ती है कि आपको कहीं भी पड़ी, सड़ी-गली मिल जाएगी, दिख जाएगी या सुनाई दे जाएगी। आम आदमी की जान सस्ती है, इसलिए तमाम व्यवस्थाएँ जो आम आदमी के लिए होनी चाहिए, माननीयों के लिए की जाती हैं।
आम आदमी एम्बुलेंस में पड़ा है, जान जाने वाली है अगर समय से अस्पताल न पहुँचा, मगर एम्बुलेंस को रोककर नेताजी को सलाम ठोककर व्यवस्था पहले निकाल देती है। क्योंकि उनका समय महत्वपूर्ण है और आम आदमी की जान की कोई कीमत नहीं। इसलिए चौराहे पर खड़ी रहती है, जान जाए तो जाए। वीवीआईपी की जान भी वीवीआईपी होती है और आम आदमी की जान भी ‘आम’। आम आदमी की जान जाती है तो जाए।
सरकारी अस्पताल में ही आम आदमी के बच्चे नहीं मरते, अब सरकारी स्कूल की छत भी गिरने लगी है। मर गए हैं आम आदमी के बच्चे फिर से। बच्चों की जान भी आम आदमी की तरह ‘आम’ थी। बेचारे मर गए। जब देश का भविष्य जात-पांत, धर्म, भाषा के आधार पर तय किया जाने लगे, तब उस देश में बच्चों का कैसा भविष्य होगा?
आम आदमी की जान सस्ती है, इसलिए देश के सरकारी स्कूल और सरकारी चिकित्सालय जर्जर हो रहे हैं, और देश के विधान भवन, संसद और सोने से मढ़े धर्मस्थल आकर्षक, मजबूत और दर्शनीय हैं। आम आदमी से वसूले गए कर से बनी सरकारों के चुने गए जनप्रतिनिधियों के पेट जब तक बढ़ते रहेंगे, आम आदमी की जान सबसे सस्ती ही रहेगी।
आम आदमी से कर लेकर उसी के पैसे पर रहनुमाओं का पलना, फिर भी आम आदमी को मुफ्त शिक्षा और चिकित्सा से वंचित रखना, उसे उल्लू बनाना और उसकी जान की कीमत को सस्ती समझना ही असली सच्चाई है।

डॉ. हरीशकुमार सिंह, प्रसिद्ध व्यंग्यकार, उज्जैन (मध्यप्रदेश)
आज की हकीकत, कुछ बदलाव होने की उम्मीद भी नगण्य। सटीक लेख
शानदार व्यंग आम आदमी खुद ही दस गुना समझ लेता है।
बहुत बढ़िया
सही कहा आद आदमी से किसी को कुछ लेना देना नहीं है सिवाय वोट के और यह भी सच है कि आद आदमी के बिना खास आदमी भी कुछ नहीं
क्या ग़ज़ब लिखा