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हिसाब–किताब में कच्ची हूँ

मगर दिल से अभी भी बच्ची हूँ।

जोड़–घटाना आता नहीं ज़्यादा,
भाग भी आता है कुछ कम।
किसको क्या दिया था, याद नहीं,
दिमाग़ ज़्यादा मैं लगाती नहीं।

सुकून चाहिए बस दो पल का,
वो तो किसी के पीछे गंवाती नहीं।
बस खुशी के पल छूट न जाएँ,
मुट्ठी में कैद कर लेती हूँ।

दुःख के बीते पलों को
रेत की भाँति बहा देती हूँ।
मुट्ठी में कैद जो पल होते हैं,
वही मेरे अपने हो जाते हैं।

दुःख के पल सब पीछे छूट जाते हैं।

अनीता अरोरा, प्रसिद्ध लेखिका, लखनऊ

One thought on “हिसाब–किताब में कच्ची हूँ

  1. बहुत महत्वपूर्ण है शांतिपूर्ण जीवन के लिए
    लेखिका की यह सलाह

    दुःख के बीते पलों को
    रेत की भाँति बहा देती हूँ।
    मुट्ठी में कैद जो पल होते हैं,
    वही मेरे अपने हो जाते हैं।

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