कहते हैं, किस्मत का लिखा कोई नहीं टाल सकता. जीवन में कब, कौन-सा मोड़ आएगा, यह कोई नहीं जानता। लेकिन कुछ लोग इस अनिश्चितता के बीच भी अपने कर्तव्यों को निभाते हुए, समाज की कठोर नजरों और अपने अंतर्मन के द्वंद के बीच फँसकर जीते हैं। कमला ऐसी ही एक स्त्री थी, जिसका जीवन एक ओर सुंदरता और प्रेम से शुरू हुआ, तो दूसरी ओर सामाजिक रूढ़ियों और अपेक्षाओं के बोझ तले दब गया।एक सुंदर शुरुआतकमला का नाम वाकई उसके व्यक्तित्व को दर्शाता था। वह कमल के फूल-सी सुंदर थी—लंबी, गोरी, चिट्टी, और आँखों में एक ऐसी चमक जो हर किसी का मन मोह लेती थी। उसका चेहरा देखकर लगता था जैसे प्रकृति ने उसे अपने हाथों से गढ़ा हो। गाँव में उसकी सुंदरता की चर्चा दूर-दूर तक थी। माँ-बाप ने भी उसकी सुंदरता को संजोया और उसका विवाह एक सुखी-संपन्न परिवार में करवाया। कमला का पति, श्याम, भी कम न था—गठीला शरीर, सौम्य स्वभाव, और एक ऐसा चेहरा जो कमला की सुंदरता के साथ खूब जँचता था। शादी के बाद कमला का नया जीवन शुरू हुआ, और कुछ ही महीनों में वह अपने ससुराल में रच-बस गई।सासू माँ, रुक्मिणी, पुराने ख्यालों की थीं। उनके लिए परिवार की इज्जत और वंश की निरंतरता सबसे ऊपर थी। फिर भी, कमला की सुंदरता और उसका व्यवहार उन्हें शुरू में बहुत भाया। श्याम तो कमला पर फिदा था। रात को जब वह कमला के साथ समय बिताता, तो उसकी आँखों में एक गर्व झलकता—जैसे उसने कोई अनमोल रत्न पा लिया हो। कमला भी अपने नए जीवन से खुश थी। वह सुबह जल्दी उठकर घर के काम निपटाती, सासू माँ की सेवा करती, और श्याम के लिए तरह-तरह के पकवान बनाती। गाँव की औरतें उसकी तारीफ करतीं, और वह मन ही मन मुस्कुरा उठती।
पहला मोड़कुछ महीनों बाद कमला ने गर्भ धारण किया। ससुराल में खुशी की लहर दौड़ गई। रुक्मिणी ने मंदिर में जाकर मन्नत माँगी कि परिवार को एक बेटा मिले, जो वंश को आगे बढ़ाए। गाँव में यह बात आम थी—बेटा होना परिवार की शान और बेटी होना एक बोझ। कमला को इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता था। वह तो बस अपनी संतान को गले लगाने के सपने देखती थी। लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतते गए, रुक्मिणी की बेचैनी बढ़ती गई। वह हर पूजा-पाठ में पोते की माँग करतीं। कमला को यह देखकर थोड़ा अजीब लगता, लेकिन वह चुप रहती।जब समय आया, कमला ने एक सुंदर-सी बेटी को जन्म दिया। उसका नाम रखा गया—राधा। कमला की आँखों में खुशी के आँसू थे जब उसने अपनी नन्हीं बेटी को पहली बार गोद में लिया। लेकिन ससुराल में सन्नाटा छा गया। रुक्मिणी का चेहरा लटक गया। “बेटी?” उन्होंने तीखे स्वर में कहा, “हमारे खानदान में पहली संतान हमेशा बेटा रहा है।” श्याम ने भी कुछ नहीं कहा। वह चुपचाप कमरे से बाहर चला गया।
कमला के दिल पर पहली बार एक चोट लगी। उसने राधा को सीने से लगाया और मन ही मन सोचा, “मेरी बेटी में क्या कमी है?”दूसरा आघातराधा धीरे-धीरे बड़ी होने लगी। वह अपनी माँ की तरह सुंदर थी, और कमला उसका पूरा ख्याल रखती। लेकिन ससुराल में उसे सिर्फ कमला का प्यार ही मिलता था। रुक्मिणी अब कमला से पहले की तरह बात नहीं करती थीं। उनकी बातों में ताने होते, “बेटी तो पराया धन होती है। वंश चलाने के लिए बेटा चाहिए।” श्याम भी धीरे-धीरे बदलने लगा। वह कमला से कम बात करता, और रात को देर से घर लौटता। कमला को लगता कि शायद वह भी अपनी माँ की बातों से सहमत है।कुछ साल बाद कमला फिर गर्भवती हुई। इस बार रुक्मिणी ने और सख्ती से पूजा-पाठ शुरू कर दिए।
“इस बार बेटा ही होना चाहिए,” वह बार-बार कहतीं। कमला चुपचाप सुनती और मन ही मन प्रार्थना करती कि उसकी संतान स्वस्थ हो। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। कमला ने दूसरी बेटी को जन्म दिया, जिसका नाम रखा गया—गीता। इस बार ससुराल में न सिर्फ सन्नाटा छाया, बल्कि एक ठंडा गुस्सा भी पनपने लगा। रुक्मिणी ने कमला को देखकर मुँह फेर लिया। “तूने तो हमारे खानदान की नाक कटवा दी,” उन्होंने कहा। श्याम का धैर्य भी जवाब दे गया। वह कमला से झगड़ने लगा, “तुमसे एक बेटा भी नहीं हो सका?”कमला टूट चुकी थी। उसकी सुंदरता, उसका व्यवहार, उसका प्यार—सब बेकार हो गया।
समाज की नजरों में वह अब सिर्फ “बेटियों की माँ” थी, जिसने अपने पति के खानदान को “नाकाम” कर दिया।अकेलापन और त्यागसमय बीतता गया, और कमला का जीवन और मुश्किल होता गया। श्याम अब घर में कम ही रहता। वह अपनी माँ की बातों में आ गया था और कमला को दोष देने लगा। एक रात, जब राधा और गीता सो रही थीं, श्याम ने कमला से कहा, “मैं इस बोझ को और नहीं उठा सकता।” कमला समझ नहीं पाई कि वह क्या कह रहा है। अगली सुबह, जब वह उठी, तो श्याम घर से जा चुका था। उसने कोई चिट्ठी नहीं छोड़ी, कोई संदेश नहीं दिया। बस, चुपचाप अपनी जिम्मेदारियों से मुँह मोड़कर चला गया।रुक्मिणी को यह सदमा बर्दाश्त नहीं हुआ। कुछ महीनों बाद उनकी तबीयत बिगड़ी, और वह भी चल बसीं।
अब कमला पूरी तरह अकेली थी—दो छोटी बेटियों के साथ, जिनके लिए उसे जीना था। गाँव के लोग ताने मारते, “पति को भी नहीं संभाल सकी।” कोई उसकी मदद को आगे नहीं आया। लेकिन कमला ने हार नहीं मानी। उसने खेतों में मजदूरी शुरू की, घरों में काम किया, और अपनी बेटियों को पढ़ाने-लिखाने की ठानी।राधा और गीता बड़ी हुईं। कमला ने अपनी सारी ताकत लगाकर उनकी शादी अच्छे घरों में करवाई। दोनों बेटियाँ ससुराल चली गईं, लेकिन कमला का दुख कोई नहीं समझ सका। वह अकेली रह गई, एक छोटे-से मिट्टी के घर में, जहाँ हर रात उसे अपने अतीत की यादें सताती थीं।
अंतहीन द्वंद कमला की जिंदगी का सबसे बड़ा द्वंद था उसका सुहाग। श्याम को गए बीस साल हो चुके थे। कोई नहीं जानता था कि वह जिंदा है या मर चुका है। न उसका कोई पत्र आया, न कोई खबर। सरकारी नियमों के मुताबिक, सात साल बाद पति की अनुपस्थिति में दाह संस्कार की इजाजत मिल सकती थी, लेकिन कमला ने ऐसा नहीं किया। वह आज भी पति के नाम का सिंदूर लगाती थी। क्यों? शायद इसलिए कि वह अभी भी उम्मीद करती थी कि श्याम एक दिन लौट आएगा। या शायद इसलिए कि वह समाज की नजरों में “सुहागन” बने रहना चाहती थी।लेकिन समाज को यह मंजूर नहीं था। अगर वह सिंदूर लगाती, तो लोग हँसते, “पति ने छोड़ दिया, फिर भी सुहागन बनी फिरती है।” अगर वह सिंदूर न लगाए, तो ताने मारते, “अब तो विधवा हो गई, फिर भी शर्म नहीं आती।” कमला इस द्वंद में फँस गई थी। वह न तो पूरी तरह सुहागन थी, न विधवा। उसकी पहचान एक अनिश्चितता के बीच झूल रही थी।हर सुबह, जब वह मंदिर जाती और भगवान के सामने सिर झुकाती, तो बस एक ही प्रार्थना करती, “हे भगवान, मुझे इस द्वंद से मुक्ति दे।” लेकिन मुक्ति मिलती नहीं थी। वह जीती रही, अपनी बेटियों के लिए, अपने वजूद के लिए, और उस समाज के लिए, जो उसे कभी समझ नहीं सका।
समाज का सजीव चित्रणकमला की कहानी सिर्फ उसकी नहीं, बल्कि उन तमाम औरतों की है जो समाज की रूढ़ियों और अपेक्षाओं के बीच पिसती हैं। यह कहानी बताती है कि कैसे एक स्त्री की सुंदरता, उसका व्यवहार, उसका प्यार—सब कुछ बेकार हो जाता है, अगर वह समाज की बनाई कसौटियों पर खरी न उतरे। यह कहानी उस विडंबना को दर्शाती है, जहाँ एक औरत को न तो सुहागन के रूप में स्वीकारा जाता है, न विधवा के रूप में। कमला का द्वंद आज भी हमारे समाज में मौजूद है—उन अनगिनत औरतों के रूप में, जो अपनी पहचान के लिए लड़ रही हैं।कमला आज भी अपने छोटे-से घर में रहती है। उसकी आँखों में अब वह चमक नहीं रही, लेकिन उसका हौसला अभी भी बरकरार है। वह इंतजार कर रही है—शायद श्याम के लौटने का, शायद अपनी मुक्ति का, या शायद उस दिन का, जब समाज उसे बिना किसी ताने के स्वीकार कर ले।

मधु मधुलिका, प्रसिद्ध लेखिका, बक्सर (बिहार)
