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कमला का द्वंद

कमला की कहानी उस हर औरत की दास्तान है जो समाज की रूढ़ियों, अपेक्षाओं और तानों के बीच अपनी पहचान खो बैठती है। सुंदरता, प्यार और त्याग के बावजूद वह केवल “बेटियों की माँ” कहलाकर अपमानित हुई। पति के छोड़ जाने के बाद भी उसने बेटियों की परवरिश अकेले की और जीवन भर सुहागन और विधवा के बीच के द्वंद में पिसती रही। यह कथा समाज की विडंबना को उजागर करती है—जहाँ स्त्री को उसके अस्तित्व से नहीं, बल्कि समाज की बनाई कसौटियों से आँका जाता है।

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