प्रेम की पराकाष्ठा

जाने कब मेरे अंदर
पनप उठीं नई कोंपलों की भांति
अद्भुत, असीम, निष्कलुष, निर्विकार, निरुद्देश्य
—- उस सूखे वृक्ष सा
जो निष्प्राण खड़ा था
मेरे समक्ष,
मैंने उसे सींचने की नाकाम कोशिश की
परंतु, असफल रही…
वह यूं ही बुत सा खड़ा रहा,
अपनी टहनियों में उसने
एक पत्ता भी न आने दिया।
मैं परिणाम की अपेक्षा किए बगैर उसे
सींचती रही और
वह ग्रास लेता रहा।
मुझसे विमुख भी न रहा,
मैं उपेक्षित हूं…!
शायद भावविहीन वही है…!

निवेदिता श्रीवास्तव गार्गी, प्रसिद्ध लेखिका, जमशेदपुर

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