प्रेम की पराकाष्ठा
जाने कब मेरे अंदरपनप उठीं नई कोंपलों की भांतिअद्भुत, असीम, निष्कलुष, निर्विकार, निरुद्देश्य—- उस सूखे वृक्ष साजो निष्प्राण खड़ा थामेरे समक्ष,मैंने उसे सींचने की नाकाम कोशिश कीपरंतु, असफल रही…वह यूं ही बुत सा खड़ा रहा,अपनी टहनियों में उसनेएक पत्ता भी न आने दिया।मैं परिणाम की अपेक्षा किए बगैर उसेसींचती रही औरवह ग्रास लेता रहा।मुझसे विमुख…
