मैं एक दीवार हूँ,
बोल नहीं सकती जो|
दीवारों के भी कान होते हैं
इस कहावत की तर्ज पर,
हर कोई ठोंक जाता है मुझ पर कील,
और टॉंग देता है अपना विषाद्|
कभी-कभी,
वे फच्च से चिपका देते हैं अपनी हँसी,
जैसे कोई पोस्टर चिपकाता है|
पीठ सटाकर, सिर टिकाकर
बैठ जाते हैं जब भी,
मैं देती हूँ उन्हें
आश्वस्त करने वाला
एक मौन सहारा
कंधों पर हाथ रखकर|
तत्पश्चात,
मुझे मिलते हैं अपशब्द,
जैसे कोई थूक देता हो
पान की पीक
परंतु
मैं बोल नहीं सकती|
मैं बहुत पुरानी दीवार हूँ
जर्जर, किन्तु
ऐतिहासिक

प्रिया राणा, लेखिका, नई दिल्ली