वो घर मेरा

वो मेरा पुराना घर,
थे बेपरवाह, नहीं था डर।
सालों बाद जब पड़े कदम,
तैर गए वो सारे मंजर।

आने लगी हँसी की आवाज़ें,
कुछ ढूँढ रही थीं मेरी निगाहें।
सब कुछ तो मिला मगर,
फीकी पड़ गईं अब मुस्कुराहटें।

देखो दीवारें भी रो पड़ीं,
बंद हुई वो भी घड़ी।
किसी आशा से तकती थी जो,
इंतज़ार में यूँ ही खड़ी।

सजता था चूल्हा उसी ओर,
माँ जगाती – “उठ, हो गई भोर!”
चारों तरफ फैला वीराना,
नहीं रहा अब कोई भी शोर।

अब तो हैं सबके अलग कमरे,
कौन उठाए किसी के नखरे?
पहले रहते थे सब एकत्रित,
आज सब लगते बिखरे-बिखरे।

अबकी मनाएँ वहीं त्योहार,
सजाएँ फिर से घर-आँगन-द्वार।
नींव न बिखरे कभी भी फिर,
इनका हम पर बड़ा उपकार।

सविता सिंह मीरा, प्रसिद्ध लेखिका, जमशेदपुर

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *