ध्यान धरे मैं आज सुन
रही बूँदों की पदचाप।
निर्मल तरल सुकोमल
आगत भगा रही संताप॥
घूँघट काढ़े छनन-छनन कर
देववधू सम उतरी।
भू से कर मीठा आलिंगन
देंह कर गई सुथरी॥
मिट्टी बन अंकुरित हुई
वो इतराई इठलाई
श्वाँस-श्वाँस में हुआ
आगमन पल-पल अपने आप।
क्रीड़ाओं का दौर चल रहा
भरी दीर्घा दर्शक
सबसे ऊँचे सिंहासन पर
आके बैठे शासक
सजा थाल बूँदों के मोती
अभिनंदन है निरखे
करतल ध्वनि की झंकारों
से काँप उठा है ताप॥
बेसुध हो बेचैन आत्मा
रगड़ धो रही काया
बूँद-बूँद के अंतरतम से
ढूँढ निकाली माया
लोभी मन संरक्षित कर
एक-एक मोती है गूँथे
गहरे में उतरेगा मिलने
गूढ़ तत्व का जाप॥

जिज्ञासा सिंह, प्रसिद्ध कवयित्री, इंदिरानगर लखनऊ