बूँदों की पदचाप…

मैं ध्यानमग्न होकर आज वर्षा की बूँदों की पदचाप सुन रही हूँ। ये बूँदें जैसे कोई देववधू बनकर घूँघट काढ़े आई हों और धरती से मधुर आलिंगन कर उसका संताप हर रही हों। मिट्टी में मिलकर अंकुरित होने लगीं, मानो जीवन की नई कोंपलें फूटने लगी हों। पूरी प्रकृति जैसे किसी रचनात्मक क्रीड़ा में सम्मिलित हो गई हो। इन बूँदों ने तन-मन को धोकर शुद्ध कर दिया, और भीतर की Maya को खोज निकाला। प्रत्येक बूँद अब एक मोती बन गई है, जिसे मन सहेज रहा है, मानो किसी गूढ़ तत्व से मिलने का जाप हो रहा हो।

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हरीतिमा

हरीतिमा कविता में कवयित्री ने प्रकृति की सौंदर्यता और उसकी अद्भुत पुनरुत्थान शक्ति को दर्शाया है। अंधड़ में धराशायी हुए वृक्षों के अवशेषों पर फिर से नवपल्लव खिलते हैं, जीवन की जिजीविषा से भरा एक बैंजनी फूलों का कतार उग आता है। कविता यह संदेश देती है कि धरती बिना किसी लेन-देन के अपार स्नेह और जीवन देती है। हरीतिमा का यह निस्वार्थ उपहार कवयित्री के अंतर्मन में कवि के उस अमर वाक्य को बार-बार गूंजने पर विवश करता है – “आ: धरती कितना देती है!”

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बूंदों के नूपुर

अम्बर चमके दामिनी, रिमझिम पड़े फुहार, सोंधी माटी की महक से भीगता देहात, सावन की झूले झूलती सखियाँ, बादलों संग गूंजता बूंदों का संगीत — यह कविता मानसून के सौंदर्य, ग्रामीण जीवन के उल्लास और प्रकृति की रूमानी छवि को भावपूर्ण रूप में प्रस्तुत करती है।

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