सुनो पलाश …
फरवरी में
जब..
तुम छितराये रहते थे ,अनन्त से,
मेरे छत की मुंडेर तक,
और खिलने लगते थे,
धरती के असीम गहराई में
धधकते ,
ज्वालामुखी के रंगों वाले फूल
तुम्हारी टहनियों पर ।
इश्श ! उचट जाता था मन
किताबों से,
झुकती जाती थी ,
मुंडेर के सिरे को पकड़ कर
बार – बार गिरने की हद तक,
तुम्हें छूने के लिए।
सम्हाल जाती थी अम्मा की डांट,
किसी को पता नहीं पलाश,
अम्मा को भी नही ,
तुम्हें छुआ था मैंने फरवरी में
तब….
मेरे एड़ियों को चूमता ,
सुनहली किनारी वाला नीला स्कर्ट
फहराने लगा था घुटनो पर।
उफ्फ! तुम्हारा दहकता मादक स्पर्श
लहक उठी थी उँगलियाँ मेरी
ललचा गई थी शायद…..
गहराई में धधकती ज्वालामुखी -तरंगे
दौड़ पड़ी थी सिंचित करने
नव यौवन को,
खिल गये थे, हजारों दहकते पलाश
मल गया था ,मेरे गालों पर
कोई ..
होरी से पहले सिंदूरी फाग..
कितनी फरवरियाँ बीत गई
अब….
,रक्त शून्य से हो चले मेरे कपोल,
खो गया है
कुम्भ के मेले में,
जरी किनारी वाला नीला स्कर्ट।
लायक बिटिया को अम्मा नहीं डाँटती हैं अब,
तरंगें शायद न ललचें इस बार,
फिर भी पलाश…
तुम्हें ही झुकना होगा इस बार
मेरे छत के मुंडेर तक।
आओ न.. खेल ले फिर फाग
होरी से पहले इस फरवरी में..

सुनीता सिंह
लेखिका, कोलकाता