कहाँ गए वो दिन
पैसा कम था, पर अपनापन भरपूर था। गली-मुहल्ले रिश्तों से भरे थे, और मुस्कानें दिखावे से नहीं, दिल से उपजती थीं।

पैसा कम था, पर अपनापन भरपूर था। गली-मुहल्ले रिश्तों से भरे थे, और मुस्कानें दिखावे से नहीं, दिल से उपजती थीं।
कविता बचपन की उन मीठी यादों को जीवंत करती है जब बारिश में “कागज़ की कश्ती” सपनों का प्रतीक बन जाती थी। न चिंता थी, न भय—बस मासूमियत और आनंद था। अब वक्त बदल गया है; बारिश, दोस्त और वो बचपन सब पीछे छूट गए हैं। “कागज़ की कश्ती” आज सिर्फ उन सुनहरे दिनों की प्यारी याद बनकर रह गई है।
हर साल फरवरी में पलाश जब अनंत से उतरकर मेरे छत की मुंडेर तक खिल जाता था, तब कुछ भीतर गुनगुनाने लगता था। ज्वालामुखी से दहकते फूलों की गरमी मेरी उँगलियों तक दौड़ जाती थी। किताबें बेअसर हो जाती थीं, मन मुंडेर पर टिक जाता था, और अम्मा की डांट भी उस खींचाव को रोक नहीं पाती थी। तब नीले स्कर्ट की सुनहरी किनारी घुटनों तक फहराती थी और गालों पर सिंदूरी रंग अपनी पहली होली खेलने लगता था। साल दर साल फरवरी आती रही, लेकिन आज कपोल रक्तहीन हो गए, स्कर्ट बीते दिनों की बात बन गई, और अम्मा की डांट एक स्मृति। लेकिन मन अब भी चाहता है कि पलाश लौटे, फिर एक बार मुंडेर तक झुके, फिर से होरी से पहले होली खेली जाए।