जंगल की आग
पलाश के दहकते फूलों से लेकर पहाड़ों पर खिलते बुरांश तक, ‘जंगल की आग’ बसंत की रंगीन और उन्मुक्त प्रकृति को आग, यौवन और अनुभूति के रूपकों में अभिव्यक्त करती है।

पलाश के दहकते फूलों से लेकर पहाड़ों पर खिलते बुरांश तक, ‘जंगल की आग’ बसंत की रंगीन और उन्मुक्त प्रकृति को आग, यौवन और अनुभूति के रूपकों में अभिव्यक्त करती है।
हर साल फरवरी में पलाश जब अनंत से उतरकर मेरे छत की मुंडेर तक खिल जाता था, तब कुछ भीतर गुनगुनाने लगता था। ज्वालामुखी से दहकते फूलों की गरमी मेरी उँगलियों तक दौड़ जाती थी। किताबें बेअसर हो जाती थीं, मन मुंडेर पर टिक जाता था, और अम्मा की डांट भी उस खींचाव को रोक नहीं पाती थी। तब नीले स्कर्ट की सुनहरी किनारी घुटनों तक फहराती थी और गालों पर सिंदूरी रंग अपनी पहली होली खेलने लगता था। साल दर साल फरवरी आती रही, लेकिन आज कपोल रक्तहीन हो गए, स्कर्ट बीते दिनों की बात बन गई, और अम्मा की डांट एक स्मृति। लेकिन मन अब भी चाहता है कि पलाश लौटे, फिर एक बार मुंडेर तक झुके, फिर से होरी से पहले होली खेली जाए।
नगर-सीमान्त पर जहाँ मेरा बसेरा है, उसके ठीक सामने पलाश का एक पेड़ है… जब से उस पर पलाश के अंगारे खिले हैं, मन शरविद्ध हरिण की भाँति बार-बार वहीं चला जाता है। जैसे फूल रौशनी हों। और फूलों का न होना रात्रितिमिर, जिसमें पेड़ आँख से ओझल हो जाएं… वसंत से बड़ा निर्मोही कौन है?