हम निकल पड़ते हैं कहीं जाने के लिए। रास्ते में कई शहर, गाँव, कसबे, पहाड़, नदियाँ, तालाब, पेड़-पौधे मिलते हैं, है ना? ऊँचे-नीचे रास्ते, हरे-भरे पौधे, नीला आकाश—ये भी तो साथ चलते हैं।
कभी सूरज, तो कभी चाँद और तारे; ठंडी हवा—ये सब भी तो मिलते हैं रास्तों में… और हम, बस चलते जाते हैं आगे।
और जब हम उन्हीं रास्तों से वापस लौटते हैं, तब भी तो ये सब मिलते हैं हमें, है ना?
फिर जब हम इश्क़ की राह पर चलते हैं, तब जाते वक्त ये सब साथ होते हैं—नई बातें, नई उम्मीदें, एक नया एहसास… सब कुछ कितना खूबसूरत लगता है।
लेकिन जब किसी कारण से उसी राह से वापस लौटना पड़ता है, तो वो छोटे-छोटे पौधे, नदियाँ, वो ठंडी हवा—ये सब क्यों नहीं महसूस होते?
वो जो उम्मीदें थीं, वो अपनापन—सब अचानक कहां चले जाते हैं?
जब इश्क़ की गलियाँ हमें बाहें फैलाकर बुला रही थीं, तब सब कुछ कितना आत्मीय था। लेकिन अब, जब हम उन्हीं गलियों को छोड़कर जा रहे हैं, तो वो हमें रोकती क्यों नहीं?
लौटने की राह इतनी उदास क्यों लगती है? जाते वक्त तो कोई उदासी नहीं थी…
चलते समय जो रास्ते के गड्ढे और पत्थर नजर नहीं आए थे, अब वही कितने बड़े लगते हैं—पार करना मुश्किल हो गया है।
ऐसा क्यों होता है? क्या इसलिए कि हम अपने आप को वहाँ कहीं खो आए हैं? और यह बात हम जानते हैं, बाकी तो कोई नहीं जानता…
या फिर ऐसा है कि ये सब अब भी हमारे आसपास हैं, लेकिन शायद हमें ही अब वो दिखते नहीं…
फिर भी, हमें चलना होगा—वापसी की राह पर। जब तक कि हमारी मुलाकात फिर से उस पुराने “ख़ुद” से ना हो जाए।
चलते रहना होगा, जब तक कि वही मुस्कान दोबारा हमारे चेहरे पर लौट ना आए… जब तक वही सुकून दोबारा साँसों में महसूस न होने लगे…
हमें चलते जाना होगा—खुद को साथ लिए हुए… उसी पुराने ‘ख़ुद’ की तलाश में।

शिल्पा सिन्हा, प्रसिद्ध लेखिका, औरंगाबाद
वापसी के रास्ते वास्तव में बोझिल होते हैं… शानदार लेख 👍🏻
Nice one story and lesson