इंद्रधनुष

एक उजली किरण छू गई यों बदन।
संदली-संदली हो गया मन-चमन।।

आज फिर ख़ूबसूरत लगी ज़िन्दगी,
ख़्वाहिशों को मिला ये खुला सा गगन।

मंद मुस्कान थिरकी अधर कोर पर,
स्वप्न के ज़ेवरों से सजे दो नयन ।

हो गई इंद्रधनुषी छटा व्योम की,
यूँ लगा फागुनी हो गया हर चलन।

चंचला सी तरंगित हुई भावना,
प्रेम ने प्रेम से कर लिया आचमन।

सज रही द्वार पर आरती अल्पना,
मंज़िलें पा गई आज मन की लगन।

ओढ़कर मीत के नाम की ओढ़नी,
भा गया प्रीति की रीति का बाँकपन।

भारती जैन ‘दिव्यांशी’

    मुरैना, मध्य प्रदेश

3 thoughts on “इंद्रधनुष

  1. आषाढ़ मास में जब अश्लेषा नक्षत्र की प्रभा हो तो बादलों की निरंतर आवाजाही में ऐसे गीत को सुनकर , पढ़कर हवाओं के झौंकों का आनंद द्विगुणित हो गया है।

    आनंददायक रचना है।

  2. आषाढ़ मास में जब अश्लेषा नक्षत्र की प्रभा हो, बादलों की निरंतर आवाजाही के बीच ऐसे गीत को पढ़ते हुए हवा के झौंको का आनंद द्विगुणित हो गया है।
    बहुत आनंददायी अनुभूति है।

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