कैक्टस

वो कभी
तन्हा न लगता है
गमले में भी कितना ख़ुश रहता है

मौसम कोई भी हो
कभी तोड़ न पाए उसको
पतझड़ में भी वो खिला रहता है

यहाँ आदत से
मजबूर सभी हैं
काँटों में भी वो हँसता रहता है

सींच रहा है
माली जिनको
उम्मीदों में वो जीता रहता है

धूप न छाया
मिलते जिनको
कैक्टस, हाँ वही कैक्टस
फिर भी तो ज़िंदा रहता है…

निवेदिता श्रीवास्तव गार्गी, प्रसिद्ध लेखिका, जमशेदपुर झारखंड

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