छोटी कहानियों में बड़े अर्थ

लेखिका --रश्मि चौधरी, इंदौर

रश्मि चौधरी के लघुकथा-संग्रह की समीक्षा

लघुकथा विधा संवदनीय शीर्ष और वैचारिक तर्क में वाणी का लोकतंत्र रचने वाली विधा है।केवल आक्रामकता, घात प्रतिघात या विरुद्ध का रचाव ही लघुकथा का चरम प्रतिमान नहीं है हिंदी लघुकथा का एक चेतस पक्ष भी है, जिसका अपना एक ऐसा शिल्पगत विन्यास है जो मनः स्थितियों के कोमल राग से ऊपरी कठोरताओं को बहाकर मानवीय सहकार में बदल देते हैं। लेखिका रश्मि चौधरी का लघुकथा संग्रह ‘संवेदनाओं का स्पर्श’ पाठकीय संवेदना का ऐसा ही सजल पक्ष उजागर करता है।संग्रह की लघुकथाओं के विषय कसकती मानवीय संवेदनाओं में विस्तृत परिधि का रचाव देती है।

जीवन के साधारण से प्रसंगों से निकली इन लघुकथाओं में कथा -कथन की शैली भले ही न हो किन्तु कथा -विकास के मोड़ कई हैं। लघुकथाओं के सामाजिक परिच्छेद में विषमता का यथार्थ एक गहरे सकारात्मक समाधान के साथ प्रस्तुत होता है।
मसलन : लघुकथा ‘समाधान’ गाँव में नहर नहीं है। ”बीज ले भी आओ तो सिंचाई की किल्ल्त ,तो हमने सोचा धीरे -धीरे हमारे दोनों खेतों को मिलाकर तालाब खोद डालें ,आने वाली बरसात में लबालब भरा जाएगा पानी से।”

लघुकथाओं में युगीन संवेदन और सांस्कृतिक प्रवाह बड़ी तरलता से बुना गया है। मानवीय आस्था और सहकार के प्रेरक भाव इनमें सहज व्यंजित होते हैं ।

वैसे इस दौर के लघुकथाकारों में कविता की-सी सिंचित जमीन भी है और फलसफों के साथ यथार्थ की दुनिया भी लेखिका संबोधन के अनुरूप भाषा संरचना के प्रति सचेत हैं लघुकथा ‘दुकानदारी’ (पृ 94 ) दुकानों पर जहाँ-तहां हम पढ़ते हैं –‘उधार मांगकर शर्मिदा न करें’ वहीँ इस लघुकथा में दुकान पर लिखा था — ”दुकानदारी मेरे लिए एक रिश्ता है।” इस लघुकथा के माध्यम से लेखिका उचित निदेशन सम्पन्न संदेश सम्प्रेषित करती है। लघुकथाओं में संगत उपमानों का सांकेतिक नियोजन कहीं – कहीं मुखर हुआ तो कहीं छूटता रहा बावजूद इसके लघुकथाएं संवेदना के शिल्पगत सौंदर्य को बुनती हैं।

कुछ लघुकताएं कोलाज में उतरती हैं तो कुछ अपनी प्रयोगशीलता में विषय वस्तु के स्तर पर यथास्थिति का अतिक्रमण करती है। मसलन : लघुकथा ‘अन डू’ (पृ 100 ) ”वास्तविक जीवन में ‘अन डू’ नहीं होता’ लघुकथा में गहरा यथार्थबोध देती पंक्ति।

‘मान्यताएं’ जैसी लघुकथा के कथा विन्यास में लेखिका चरित्रों में रंग भरती है इनमें यथार्थ का परिदृश्य भीतर के मनोभावों को चेहरे की भाषा में व्यंजना देता है। जबकि ‘सम्मान’ ,’भावनाएं’ ,’फूटे फुग्गे’,’लिफाफा’ जैसी कुछ लघुकथाएं यथास्थिति का अतिक्रमण करती है।
कुछ लघुकथाओं में मनोविज्ञान फूटता है तो कुछ में समाजशास्त्र लक्षित होता है। बदलाव की बारीक़ रेखाओं के मध्य इनमें जो वैचारिक स्पर्श विद्यमान रहता है वही संग्रह को विशेष बनाता है। लघुकथाएं काल के युगीन संवेदन का प्रतिनिधि है इनकी विषय वस्तु राष्ट्रीय -सांस्कृतिक ,सामाजिक और परिवारिक बुनावट में अबाधित और लक्ष्यगामी है। ये थकी हुई प्रतीक्षाओं में आम आदमी के भीतर संवादी मुखरताओं से आरोहित करती हुई एक ऐसे शीर्ष पर ले जाती है जहाँ से उसकी संवेदनाओं को स्पर्श किया जा सके।

समीक्षक — डॉ शोभा जैन,इंदौर (सुप्रसिद्ध साहित्यकार, इंदौर)

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