
प्रतिभा इंदु
प्रेम मिलन के अपने ये दिन बीत न जाएँ, पर
आजा रे, ओ आजा प्रियवर, हो न जाए प्रेम विफल।
आज जुदाई के दिन कितना मन मेरा घबराए,
प्रियतम के बिन आस मिलन की प्रेम की अगन जलाए।
नीरस और मुरझाया जीवन, कर दो आप सजल।
आजा रे, ओ आजा…
यादों में भीगी रातें, नैनों में नींद न आए,
सोच के तेरी चाँद-सी सूरत,
दिल का चैन चुराए।
पास अगर तुम आ जाओ तो दिल के खिलें कमल।
आजा रे, ओ आजा…
कितना है बेरंग तुम्हारे बिन, जीवन खुशहाल नहीं,
जीवन की वीणा में भी प्रियवर, कोई सुर-ताल नहीं।
छवि मेरे गीतों में तेरी, तुम ही मेरी ग़ज़ल।
आजा रे, ओ आजा…
बड़ा कठिन है मिलन हमारा, जतन समझ न आए,
अगन विरह की मेरे तन और मन को रही जलाए।
मधुर मिलन की इस उलझन का आप ही ढूँढ़ो हल।
आजा रे, ओ आजा…
देर लगा न, आ भी जा अब, होने लगी पहर,
कब से पीते आए जुदाई का हम लोग ज़हर।
तुमसे मिलकर जीवन मेरा, प्रियवर, हुआ सफल।
आजा रे, ओ आजा…
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