gulmohar

प्रेम मिलन

चाँदनी रात में प्रियतम की प्रतीक्षा करती एक युवती प्रेम मिलन

प्रतिभा इंदु

प्रेम मिलन के अपने ये दिन बीत न जाएँ, पर
आजा रे, ओ आजा प्रियवर, हो न जाए प्रेम विफल।

आज जुदाई के दिन कितना मन मेरा घबराए,
प्रियतम के बिन आस मिलन की प्रेम की अगन जलाए।
नीरस और मुरझाया जीवन, कर दो आप सजल।
आजा रे, ओ आजा…

यादों में भीगी रातें, नैनों में नींद न आए,
सोच के तेरी चाँद-सी सूरत,
दिल का चैन चुराए।
पास अगर तुम आ जाओ तो दिल के खिलें कमल।
आजा रे, ओ आजा…

कितना है बेरंग तुम्हारे बिन, जीवन खुशहाल नहीं,
जीवन की वीणा में भी प्रियवर, कोई सुर-ताल नहीं।
छवि मेरे गीतों में तेरी, तुम ही मेरी ग़ज़ल।
आजा रे, ओ आजा…

बड़ा कठिन है मिलन हमारा, जतन समझ न आए,
अगन विरह की मेरे तन और मन को रही जलाए।
मधुर मिलन की इस उलझन का आप ही ढूँढ़ो हल।
आजा रे, ओ आजा…

देर लगा न, आ भी जा अब, होने लगी पहर,
कब से पीते आए जुदाई का हम लोग ज़हर।
तुमसे मिलकर जीवन मेरा, प्रियवर, हुआ सफल।
आजा रे, ओ आजा…
इन रचनाओं को भी पढ़िए और अपनी राय अवश्य व्यक्त करें

घुँघरू
थोड़ी सी नमी बाकी रहने दो
चेहरे और नक़ाब
मंदिर की वो पावन मुलाकात
आदि शक्ति जगदंबे भवानी
प्रेम मिलन

One thought on “प्रेम मिलन”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *