
डॉ. प्रियंका कुमार, गांधीनगर
कब तक ऐसी खबरें हमें झकझोरती रहेंगी और कुछ दिनों बाद सब कुछ सामान्य हो जाएगा? हम वर्ष 2026 में पहुँच चुके हैं। महिलाएँ हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा सिद्ध कर रही हैं, फिर भी दहेज, घरेलू हिंसा, बलात्कार और स्त्री-विरोधी अपराध क्यों जारी हैं? प्रश्न केवल अपराध का नहीं, बल्कि उस मानसिकता का है, जो किसी पुरुष को यह अधिकार देती है कि वह स्त्री पर नियंत्रण करे, उसे अपमानित करे या उसके साथ हिंसा करे।इस समस्या की जड़ परवरिश में है। बचपन से यदि लड़कों को सिखाया जाए कि गुस्सा ताकत है और स्त्री पर अधिकार उनका जन्मसिद्ध हक है, तो आगे चलकर यही सोच अपराध का रूप ले सकती है। इसलिए परिवर्तन कानून से पहले घर और परवरिश में आना आवश्यक है।
संस्कारों की पहली पाठशाला: माँ का गर्भ
संतान का निर्माण गर्भ से ही शुरू होता है। अभिमन्यु और शिवाजी महाराज के उदाहरण हमारी परंपरा में गर्भकालीन संस्कारों के महत्व को रेखांकित करते हैं। परंतु केवल माँ ही नहीं, पूरे परिवार का वातावरण बच्चे के व्यक्तित्व को प्रभावित करता है। अपनी बेटी के लिए हम जिस प्रेम, पोषण और सम्मान की अपेक्षा करते हैं, वही सम्मान घर की बहू को भी मिलना चाहिए। “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” तभी सार्थक होगा, जब हम किसी और की बेटी को बहू बनाकर भी बेटी जैसा सम्मान दें।
परवरिश में समानता: बदलाव की दूसरी शर्त
बच्चों के लिए नीले और गुलाबी रंग, खेल, काम और जिम्मेदारियाँ लिंग के आधार पर तय करना बंद करना होगा। बेटियों को रसोई के साथ बैंक, बाजार और आर्थिक लेन-देन के काम सिखाएँ और बेटों को भी खाना बनाना, घर संभालना और देखभाल करना सिखाएँ। जीवन-कौशल किसी एक लिंग की संपत्ति नहीं हैं। बेटों से यह कहना पर्याप्त नहीं कि “लड़के रोते नहीं।” उन्हें यह भी सिखाना होगा कि “लड़के किसी को रुलाते नहीं।” उसी प्रकार बेटियों को भी सिखाइए कि वे रोती नहीं। बेटियों को आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता और अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने का साहस देना होगा।
अन्याय पर दंड की तीसरी मांग
माता-पिता का प्रेम आवश्यक है, लेकिन बेटे की गलतियों को छिपाना प्रेम नहीं, उसके भविष्य को नुकसान पहुँचाना है। बच्चों को छोटी उम्र से ही सम्मान, सहमति, व्यक्तिगत सीमा और जिम्मेदारी का अर्थ समझाना चाहिए।यदि कोई बेटा गंभीर अपराध करता है, तो परिवार को उसके अपराध का समर्थन करने के बजाय न्याय और कानून के साथ खड़ा होना चाहिए। अहिल्याबाई होलकर जैसे उदाहरण हमें सिखाते हैं कि न्याय रिश्तों से ऊपर होना चाहिए। यदि बेटा पत्नी पर हिंसा करे, तो परिवार को बहू के साथ खड़ा होकर बेटे की गलती का विरोध करना चाहिए।
विद्यालय: चरित्र निर्माण की चौथी प्रयोगशाला
विद्यालयों को केवल परीक्षा और अंकों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। नैतिक शिक्षा, लैंगिक समानता, भावनात्मक समझ, वित्तीय साक्षरता और आयु-उपयुक्त व्यापक यौन शिक्षा को विद्यालयी संस्कृति का हिस्सा बनाना होगा। सहशिक्षा का उद्देश्य केवल साथ पढ़ाना नहीं, बल्कि बच्चों को सम्मान, समानता, संवाद और जिम्मेदार व्यवहार सिखाना भी है। एक-एक वोट मिलकर सरकार बनाता है; उसी प्रकार एक-एक परिवार मिलकर समाज बनाता है। संस्कारी समाज केवल कानूनों से नहीं, बल्कि घरों में दिए गए मूल्यों से बनता है। इसलिए परिवर्तन की शुरुआत हर घर से करनी होगी।हमें केवल संतान को जन्म नहीं देना है, बल्कि ऐसी पीढ़ी का निर्माण करना है, जो स्त्री-पुरुष समानता, सम्मान, संवेदना और न्याय को अपने जीवन का स्वाभाविक हिस्सा माने। यही परवरिश भविष्य के अपराधों को रोकने की सबसे मजबूत नींव बन सकती है।
