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.. अंतर्मन जागा और शरद अरोरा ने छोड़ दिया मांसाहार!

शरद अरोरा के मांसाहार त्याग और जीवदया संकल्प का प्रतीक शाकाहारी भोजन शाकाहार और जीवदया अपनाने का संकल्प करुणा और अहिंसा की दिशा में एक प्रेरक कदम है.

एक बेटे का जीव दया का संकल्प, अनेक लोगों के लिए बनेगा प्रेरणा

suresh parihar

सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वायर न्यूज़, पुणे

कल महिदपुर रोड के कपड़ा व्यवसायी अमित कांठेड़ की फेसबुक पोस्ट से एक ऐसी खबर मिली, जिसने मन को प्रसन्नता और गर्व से भर दिया. मेरे अजीज मित्र स्वर्गीय गिरधारीलाल अरोरा के बेटे शरद अरोरा ने मांसाहार त्यागकर शाकाहार और जीवदया को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लिया है. शरद का यह निर्णय केवल उनके व्यक्तिगत जीवन में आया बदलाव नहीं है, बल्कि यह समाज के लिए करुणा, संवेदना और अहिंसा का एक प्रेरक संदेश भी है.
एक पंजाबी परिवार में पले-बढ़े शरद का यह निर्णय इसलिए भी विशेष है कि खानपान की वर्षों पुरानी आदतों को बदलना आसान नहीं होता. लेकिन जब मन में किसी जीव के प्रति करुणा जागती है और उसकी पीड़ा का एहसास होने लगता है, तब जीवन की दिशा बदलने लगती है. शरद ने अपने संकल्प से यही साबित किया है कि परिवर्तन के लिए उम्र, परिवार, परंपरा या खानपान की पुरानी आदतें बाधा नहीं बन सकतीं. जरूरत है तो बस भीतर एक संवेदनशील मन और दृढ़ इच्छाशक्ति की.

महिदपुर रोड में धर्म और अध्यात्म की बह रही है अविरल धारा
शरद के इस निर्णय के पीछे महिदपुर रोड में इन दिनों चल रही धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियों की भी महत्वपूर्ण भूमिका दिखाई देती है. सांवरियाजी की पैदल यात्रा हो, भगवान शंकर की सवारी, जन्माष्टमी का उत्सव हो या श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन, इन सभी आयोजनों ने क्षेत्र में एक विशेष धार्मिक वातावरण निर्मित किया है.
इसके साथ ही जैन समाज का चातुर्मास भी चल रहा है. परमपूज्य डॉ. अमृतरसाजी, निरागरसाश्रीजी तथा जिनांशरसाजी के पावन सान्निध्य में तप-तपस्याओं की अविरल धारा प्रवाहित हो रही है. महिदपुर रोड के इतिहास में पहली बार 62 तपस्वियों ने सिद्धि तप जैसी कठिन तपस्या कर एक नया अध्याय रचा है.
यह केवल धार्मिक आयोजनों की श्रृंखला नहीं है, बल्कि आत्मशुद्धि, संयम, त्याग और जीवों के प्रति करुणा का वातावरण बनाने का प्रयास भी है. जब समाज में धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित न रहकर व्यक्ति के आचरण में उतरने लगता है, तब उसके वास्तविक परिणाम सामने आने लगते हैं.
ऐसे वातावरण में शरद अरोरा का संकल्प एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर सामने आया है. धार्मिक प्रवचनों और आध्यात्मिक वातावरण से प्रेरित होकर किसी व्यक्ति का अपनी जीवनशैली में परिवर्तन करना इस बात का संकेत है कि धर्म की सार्थकता तभी है, जब वह हमारे विचारों और व्यवहार में दिखाई दे. इस पुनीत कार्य के लिए सभी धर्मप्रेमी लोगों को साधुवाद. लेकिन शरद ने अपने संकल्प से इस वातावरण को एक व्यक्तिगत और जीवंत उदाहरण में बदल दिया है.
चेतना बढ़ती है तो करुणा स्वयं जागती है
प्रसिद्ध विचारक ओशो ने मांसाहार और अहिंसा के संदर्भ में चेतना, करुणा और आत्मबोध को विशेष महत्व दिया है. उनके विचारों का सार यह है कि मनुष्य की चेतना जैसे-जैसे विकसित होती है, वैसे-वैसे उसके भीतर दूसरे जीवों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ती है और हिंसा से दूर होने की प्रेरणा जागती है.
ओशो के विचारों के अनुसार, जब हम किसी जीव की पीड़ा, भय और जीवन के प्रति उसके मोह को समझने लगते हैं, तब उसके प्रति हमारा दृष्टिकोण बदलने लगता है. जिस जीव को हम पहले केवल भोजन के रूप में देखते थे, उसमें भी हमें जीवन, संवेदना और अस्तित्व दिखाई देने लगता है.यही चेतना का विस्तार है. मनुष्य के सामने प्रकृति ने भोजन के अनेक विकल्प उपलब्ध कराए हैं. फल, सब्जियां, अनाज, दालें और अनेक प्रकार के शाकाहारी खाद्य पदार्थ हमारे जीवन का आधार बन सकते हैं. ऐसे में जीवों के प्रति करुणा का भाव जागने पर व्यक्ति अपनी खानपान की आदतों पर पुनर्विचार कर सकता है.यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी को जबरदस्ती मांसाहार छोड़ने के लिए बाध्य करना उचित नहीं है. किसी भी व्यक्ति के जीवन में स्थायी परिवर्तन दबाव से नहीं, बल्कि उसके अपने विवेक और अंतर्मन से आता है.
यदि कोई व्यक्ति केवल दूसरों के कहने पर किसी चीज का त्याग करता है, तो संभव है कि वह त्याग उसके लिए बोझ बन जाए. लेकिन जब वही निर्णय स्वयं की चेतना और संवेदना से उत्पन्न होता है, तब वह जीवन का सहज हिस्सा बन जाता है. शरद अरोरा का संकल्प इसी आत्मप्रेरणा का उदाहरण है. यह किसी पर थोपा गया निर्णय नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर जागे भाव का परिणाम है. और शायद यही कारण है कि उनका यह कदम दूसरों को भी सोचने और प्रेरित होने का अवसर देता है.

परमपूज्य डॉ. अमृतरसाजी के प्रवचनों का संदेश: अहिंसा ही सच्चे धर्म का आधार
चातुर्मास के दौरान महिदपुर रोड में विराजित परमपूज्य डॉ. अमृतरसाजी के प्रवचनों से भी यही सीख मिलती है कि धर्म का वास्तविक स्वरूप जीवों के प्रति दया, करुणा और अहिंसा के आचरण में निहित है.जैन दर्शन में अहिंसा को सर्वोच्च महत्व दिया गया है. हिंसा को दुर्गति का द्वार, पाप का समुद्र और आध्यात्मिक पतन का कारण बताया गया है. यदि किसी व्यक्ति के जीवन में दया और करुणा का भाव नहीं है, तो केवल बाहरी धार्मिक क्रियाएं, तपस्या, दान और अनुष्ठान उसके आचरण को पूर्णता प्रदान नहीं कर सकते.
तप का उद्देश्य केवल शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि मन के विकारों, कषायों और हिंसक प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त करना है. दान का वास्तविक मूल्य भी तभी है, जब उसके पीछे करुणा और परोपकार का भाव हो.
जैन दर्शन के तत्वार्थ सूत्र में भी अहिंसा और जीवों के प्रति संयम का महत्व प्रतिपादित किया गया है. जीवों के प्रति राग-द्वेष, क्रोध और हिंसक भावों से मुक्त होना आत्मकल्याण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना गया है.समस्त संसार जीवों से भरा हुआ है. प्रत्येक जीव अपने अस्तित्व और जीवन के प्रति संवेदनशील है. किसी दूसरे जीव के जीवन को अपने स्वार्थ या स्वाद के लिए समाप्त करने की भावना से बचना ही अहिंसा के प्रति जागरूकता का प्रारंभ है.इस दृष्टि से शरद अरोरा का संकल्प केवल खानपान में बदलाव नहीं, बल्कि अपने विचारों और जीवन के प्रति दृष्टिकोण में आए परिवर्तन का भी प्रतीक है.
शरद अरोरा का संकल्प बनेगा अनेक लोगों की प्रेरणा
आज समाज में धार्मिक आयोजन बहुत होते हैं. कथाएं सुनी जाती हैं, प्रवचन होते हैं, यात्राएं निकाली जाती हैं और व्रत-उपवास किए जाते हैं. लेकिन इन आयोजनों की सबसे बड़ी सार्थकता तब होती है, जब उनसे प्रेरित होकर कोई व्यक्ति अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाता है.शरद अरोरा ने मांसाहार छोड़कर शाकाहार और जीवदया अपनाने का जो निर्णय लिया है, वह इसी परिवर्तन का उदाहरण है.यह संकल्प हमें याद दिलाता है कि धर्म का प्रभाव केवल मंदिरों, प्रवचनों और धार्मिक आयोजनों तक सीमित नहीं रहना चाहिए. उसका प्रभाव हमारी थाली, हमारी जीवनशैली, हमारे व्यवहार और दूसरे जीवों के प्रति हमारे दृष्टिकोण में भी दिखाई देना चाहिए. किसी जीव के प्रति दया का भाव रखने के लिए किसी बड़े पद, विशेष पहचान या असाधारण सामर्थ्य की आवश्यकता नहीं होती. एक छोटा-सा व्यक्तिगत निर्णय भी समाज में सकारात्मक संदेश पहुंचा सकता है.
शरद का यह कदम उन लोगों के लिए भी प्रेरणा है, जो अपने जीवन में बदलाव लाना चाहते हैं, लेकिन पुरानी आदतों और सामाजिक परिस्थितियों के कारण निर्णय नहीं ले पाते. उनका उदाहरण बताता है कि जब मन में संकल्प दृढ़ हो, तो नई शुरुआत की जा सकती है.स्वर्गीय गिरधारीलाल अरोरा के बेटे शरद अरोरा को उनके इस संकल्प के लिए हार्दिक साधुवाद और शुभकामनाएं.
उम्मीद है कि परमपूज्य डॉ. अमृतरसाजी की प्रेरणा, चातुर्मास के आध्यात्मिक वातावरण और शरद अरोरा के इस निर्णय से महिदपुर रोड में अनेक लोग जीवदया और अहिंसा के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित होंगे.

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