
कीर्ति राणा, इंदौर
तुलसी नगर के घर में छोटे से उद्यान के एक हिस्से में फुलवारी और दूसरे हिस्से में तरकारी-यह सब महारानी के बागवानी प्रेम से संभव हुआ है। अपने को तो पानी देने की भी फुरसत नहीं मिलती। पिछले दिनों जब माली राम कुंवर पेड़ों की छँटाई कर रहे थे, तो मैंने गुड़हल के पेड़ की कलम तैयार करने को कह दिया।
महारानी ने पूछ लिया, तुम क्या करोगे? मैंने कहा, उज्जैन में भक्त नगर वाले मकान की क्यारी में लगा दूँगा। शोल्डर बैग में कलम ले आया और उस क्यारी में रोप दी थी। एक-आध सप्ताह उत्सुकता रही कि कलम पनपी या नहीं? यह तो गनीमत रही कि (प्रचलित चुटकुले की तरह) मैंने कलम को उखाड़कर नहीं देखा।
अभी सोमवार की सुबह क्यारी पर नज़र पड़ी, तो उस कलम में नन्हीं लाल कली हिल-डुल रही थी। ऐसा लग रहा था, हरि चादर में लपेटकर जैसे नर्स नवजात शिशु को परिजनों को दिखाने लाती है। रोशनी में वह नवजात आँखें तो नहीं खोल पाता, लेकिन उसके गुलाबी गाल, ओठ, रूई के फाहे से कोमल गुलाबी पैर अहसास कराते हैं कि लो, मैं आ गया।
किसी सुंदरी के थोड़ी-सी गर्दन मोड़ने पर उसके कान में पहने सुर्ख लाल लंबे बुंदे हिलते-डुलते नज़र आते हैं, गुड़हल की कली भी वैसे ही हवा में हिल रही थी। कल जिसका कली रूप देखा था, मंगलवार की सुबह उस कली ने सुबह हल्की-सी उबासी ली कि मेरी नींद खुल गई है। इधर मैंने सुबह की चाय और नाश्ता किया, उधर गुनगुनी धूप ने उस अधखिली कली का शृंगार कर दिया था। अब वह कली जूड़े में लगा खिलखिलाता-बड़ा-सा फूल बन चुकी थी। जैसे नन्हीं बेटी कब बड़ी हो जाती है, वह कली भी फूल का आकार ले चुकी थी। प्रकृति को रत्नगर्भा भी इसीलिए कहते हैं कि पहली बारिश के बाद उस रूखी-सूखी जमीन वाले गार्डन में भी कहीं घास, दूर्वा, अनाप बीज स्वतः अंकुरित हो जाते हैं।
गुड़हल की कलम, उसमें फूटी कली, कली से बना फूल! यह फूल गणेश जी को समर्पित करके जो आनंद महसूस किया, वह अवर्णनीय है। उस कलम की इस यात्रा ने यह भी समझने को मिला कि धैर्य रखने का मतलब क्या होता है, कर्म किए जा, फल की चिंता मत कर रे इंसान वाले गीत का भी यह सुखद-सकारात्मक परिणाम है। पर्यावरण संरक्षण के प्रति मेरा एक छोटा-सा प्रयास सफल होने की खुशी के साथ यह भी खयाल आया कि उज्जैन से यदि कहीं अन्यत्र जाना पड़ जाए, तो भी अब ये गुड़हल वैसे ही फूल देता रहेगा, जैसे मकान के दूसरे कोने में लगी चाँदनी और मीठा नीम सबके काम आ रहे हैं। किसने पौधा लगाया, यह महत्वपूर्ण नहीं है, वह पौधा भी कहाँ इतराता है अपने फल-फूल पर।
