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मैं और …

मैं और अनकही अनुभूति पर आधारित भावपूर्ण हिंदी कविता कुछ रिश्तों को नाम नहीं दिया जा सकता। कुछ अनुभूतियाँ शब्दों में नहीं उतरतीं।

शावर भकत “भवानी

मैं और…?
क्या कहूँ?
सम्बोधन से परे।
मात्र भावना
या
कुछ और…

अदृश्य अस्तित्व अन्वेषण
या
निःशब्द अंतर्मन शोर।

शब्दों में व्यक्त
या
अव्यक्त
या
हृदय की टीस।

कल्पना सागर शायद,
भ्रम नाममात्र भी नहीं,
मरीचिका भी नहीं
या
मिथ्या उलझन।

जो भी है,
अद्भुत है।
पावन, पुनीत अर्चन है,
संवेदनाओं का संगम है।

समाहित ध्वनि-कम्पन,
जिसे मात्र मन सुन सकता है
या
एकमात्र चाहो तो…

प्रश्नों-उत्तर में नहीं,
खोया-पाया से परे,
अनुभूति की
उच्चतम पराकाष्ठा में स्थान,
प्रदर्शन कदापि नहीं।

नाम-संबंधों से परे,
अपेक्षा-उपेक्षा से पृथक,
सदा सर्वत्र उपस्थित।

रुदन, मुस्कान से मुक्त।
कुछ नहीं होकर भी
शायद सर्वस्व सार।

अवर्णनीय, समझ से परे,
अंतरात्मा अनुभूति
और
कुछ भी नहीं।

मात्र है
और
निकट है।

हाँ! आजीवन संग
या
तदोपरांत भी,
मैं और…?

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