
अपूर्वा
वह आती है,
बालों में सरसों का तेल लगाए,
थके हुए कदमों में भी
बित्ते भर उजास लिए,
अपने बच्चे को
बिल्डिंग के गार्ड के पास छोड़कर,
अपनी साँसों में विश्वास भरकर
आती है वह,
न जाने कितने डर पीछे छोड़कर।
तवा माँजते हुए
खनकती हैं
उसके हाथों में हरी चूड़ियाँ,
और
धीरे-धीरे
फीकी पड़ती जाती है
छठ पर लगाई उसकी मेहँदी।
हर घर में
अपनी मेहनत की
सुगंध छोड़ती हुई
आगे बढ़ती जाती है।
खेलता है नन्हा प्रियांशु
बिल्डिंग के बच्चों के साथ,
बचपन भला कब जानता है
कोई भेद करना।
मेरे द्वार पर आकर
बाहर से झाँकता है नन्हा प्रियांशु,
शायद आ जाती है
हर थोड़ी देर में उसे अपनी माँ की ख़ुशबू।
अपनी अबोध आँखों से देखता है
उसे पसीने में डूबा
और चुपचाप सीखता है
श्रम का पहला पाठ।
वह पहचानता है
अपनी माँ के गरिमामय जीवन की गंध।
न जाने
कितने घरों को सहेजकर
वह थकान से चूर
अपनी चौखट तक पहुँचती है,
फिर भी सुनती है
पाँच वर्ष के उस बच्चे
की दिन भर की अनगिनत बातें।
अपने भीतर छिपे दुखों को
स्पर्श तक नहीं करने देती,
उसके बाल मन को
सुंदर कहानियों से भरती है।
रात भर थपक-थपककर
दिन का कोटा पूरा करती है
और ऐसे ही
बनती जाती है अजेय
और बुनती जाती है आकाश
अपने और अपनों के लिए।
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