
सपना परिहार, नागदा जंक्शन
वर्तमान समय में हमारी शिक्षा व्यवस्था और आम बोलचाल की भाषा के बीच इतना बड़ा अंतर आ गया है कि जब कोई व्यक्ति शुद्ध हिंदी में बात करता है, तो उसे अक्सर आलोचना या उपेक्षा का सामना करना पड़ता है—चाहे सामने माता-पिता हों, दोस्त हों, आस-पड़ोस के लोग हों या स्वयं हिंदी विषय का शिक्षक। आज अधिकतर कॉन्वेंट, मिशनरी, सीबीएसई और आईसीएसई बोर्ड के विद्यालयों में हिंदी शिक्षकों के लिए भी अंग्रेजी में बातचीत करना अनिवार्य-सा हो गया है। प्रबंधन का तर्क होता है कि उन्हें हिंदी समझ नहीं आती। ऐसे में अध्यापन कला में प्रवीण और शिक्षण के अनेक कौशल रखने वाला शिक्षक भी केवल अंग्रेजी न बोल पाने के कारण अच्छे रोजगार के अवसर से वंचित हो जाता है। यदि मैं अपने व्यक्तिगत अनुभव की बात करूँ, तो लगभग बीस वर्षों से हिंदी का अध्यापन कर रही हूँ। कई बार अंग्रेजी माध्यम विद्यालयों में साक्षात्कार के दौरान यह सुनना पड़ा कि “अंग्रेजी बोलना अनिवार्य है।” यह बात मन को बहुत ठेस पहुँचाती है। जब मुझे अंग्रेजी उतनी सहजता से नहीं आती, तो क्या सामने वाला पूरे आत्मविश्वास से यह कह सकता है कि उसे हिंदी आती है?हिंदी के प्रति यह उपेक्षा देखकर दुख होता है। बोलना तो दूर, आज लोग हिंदी लिखने से भी कतराने लगे हैं।
हिंग्लिश और व्हाट्सएप भाषा का बढ़ता चलन
बच्चों की स्थिति और चिंताजनक है। उन्हें पढ़ाते या लिखवाते समय अक्सर वे व्हाट्सएप वाली ‘रोमन-हिंदी’ यानी हिंग्लिश में लिखते हैं। पूछने पर सहजता से कहते हैं—”मैम, हमें समझ तो आ ही जाता है!”ऐसा लगता है कि हिंदी अब केवल परीक्षा पास करने का विषय बनकर रह गई है और व्यावहारिक जीवन में उसका प्रयोग लगातार कम हो रहा है।
विद्यालयों में यदि कोई शिक्षक हिंदी में बात करता दिख जाए, तो प्रबंधन या समन्वयक तुरंत कह देते हैं—”आप अंग्रेजी में बात कीजिए।” मैं मानती हूँ कि समय के साथ बदलाव आवश्यक है और नई भाषाएँ सीखने में कोई बुराई नहीं, लेकिन क्या अंग्रेजी सीखने के लिए अपनी मातृभाषा से दूरी बनाना जरूरी है?आज स्थिति यह है कि बच्चों को बताना पड़ता है कि ’68’ को हिंदी में ‘अड़सठ’ कहते हैं। उन्हें हिंदी की गिनती और वर्णमाला तक नहीं आती, फिर भी अभिभावक गर्व से कहते हैं—”हमारा बच्चा इंग्लिश मीडियम में पढ़ता है।” हिंदी की बात आते ही कहीं न कहीं झिझक दिखाई देती है।
हिंदी शिक्षक की उपेक्षा
कई बार केवल अंग्रेजी न बोल पाने के कारण मुझे साक्षात्कार में अस्वीकार किया गया। मैंने शिक्षा को कभी केवल ‘रोजगार’ की दृष्टि से नहीं देखा; मुझे पढ़ाना प्रिय है। एक शिक्षक के रूप में मेरा दायित्व है कि बच्चों को हिंदी का सम्यक ज्ञान दूँ।लेकिन क्या हिंदी पढ़ाना इतना आसान है कि कोई भी किताब उठाकर पढ़ा दे? क्या भाषा की बारीक व्याकरणिक संरचना, मात्राओं का सही ज्ञान, शब्दों की विविधता और उसके विशाल शब्दकोश को समझाना इतना सरल है?हिंदी का संसार इतना समृद्ध है कि अध्ययन करते-करते थक जाएँगे, लेकिन साहित्य और भाषा की संभावनाएँ समाप्त नहीं होंगी।इसके बावजूद हिंदी शिक्षक को वह श्रेय और सम्मान नहीं मिलता, जिसका वह हकदार है। गैर-सरकारी विद्यालयों में सामान्य हिंदी शिक्षक 10 से 20 हजार रुपये के सीमित वेतन पर काम करने को मजबूर है। छोटी जगहों पर तो नाममात्र के वेतन में ‘काम चलाऊ’ शिक्षक रख लिए जाते हैं।
समाज की मानसिकता और हमारी विडंबना
आज यदि कोई व्यक्ति हिंदी में बात करता है, तो उसे कम पढ़ा-लिखा या पिछड़ा समझने की मानसिकता दिखाई देती है, भले ही उसके पास बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ क्यों न हों। अंग्रेजी का प्रभाव हमारे रहन-सहन और परिवेश पर इतना हावी हो चुका है कि हिंदी बोलने वाला व्यक्ति हीन समझे जाने लगता है।यह हमारे समय की बड़ी विडंबना है कि आधुनिकता की दौड़ में आगे बढ़ते हुए हम अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं। वर्ष में एक बार ‘हिंदी पखवाड़ा’ या ‘हिंदी दिवस’ मनाकर कुछ गोष्ठियाँ, कार्यशालाएँ और प्रतियोगिताएँ आयोजित कर हम अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। फिर अगले वर्ष तक हिंदी को उसके हाल पर छोड़ देते हैं।हिंदी कोई ‘टाइमपास’ का जरिया नहीं है और न ही इसे हल्के में लेने वाली भाषा। यह हमारी मातृभाषा, हमारी पहचान, सम्मान और अभिमान है।अंग्रेजी सीखना समय की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन हिंदी से दूरी बनाना आधुनिकता की निशानी नहीं। भाषाएँ जितनी अधिक हों, उतना ही अच्छा; पर किसी दूसरी भाषा को अपनाने के लिए अपनी भाषा को कमतर आँकना उचित नहीं। इसलिए हिंदी भाषा और हिंदी शिक्षकों को कभी कमतर आँकने की भूल न करें। हिंदी को सम्मान केवल हिंदी दिवस पर नहीं, बल्कि अपने व्यवहार और रोजमर्रा के जीवन में भी मिलना चाहिए।
