
रुचि अग्रवाल, सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल)
नायरा को हमेशा लगता था कि प्रेम केवल शब्दों से नहीं चलता। कुछ रिश्ते ऐसे भी होते हैं, जो आँखों की नमी पढ़ लेते हैं, चेहरे की मुस्कान के पीछे छिपी थकान समझ लेते हैं और बिना कुछ कहे दिल की आवाज़ सुन लेते हैं।
शायद इसी विश्वास ने उसे विराज से प्रेम करना सिखाया था।
वह उससे बेहद प्रेम करती थी। इतना कि उसकी हर खुशी में अपनी खुशी ढूँढ़ लेती और उसके हर दुख के लिए मन ही मन दुआ करती। लेकिन नायरा का प्रेम शोर मचाने वाला प्रेम नहीं था। वह अपने एहसासों का प्रदर्शन नहीं करती थी। उसे शिकायतें जमा करना भी नहीं आता था।
जब मन दुखता, वह चुप हो जाती।
जब दिल टूटता, वह मुस्कुरा देती।
और जब किसी की ज़रूरत महसूस होती, तब भी वह किसी को आवाज़ नहीं देती।
उसे लगता था कि जिसे वह अपना कहती है, वह उसकी खामोशियों को भी सुन लेगा।
लेकिन वह गलत थी।
विराज उससे प्यार करता था, शायद अपने तरीके से। मगर उसके पास नायरा की चुप्पियों को समझने का समय नहीं था। वह उसके शब्द सुन लेता था, मगर उसकी खामोशी नहीं। वह उसकी हँसी देख लेता था, मगर उसकी आँखों में छिपे इंतज़ार को नहीं।
दिन बीतते गए।
नायरा इंतज़ार करती रही।
कभी एक संदेश का।
कभी एक फोन कॉल का।
कभी सिर्फ़ इस एहसास का कि कोई है, जो उसे याद कर रहा है।
लेकिन हर बार उसके हिस्से में बस इंतज़ार आया।
कई बार उसने चाहा कि विराज उससे पूछे—
“क्या हुआ, नायरा?”
“तुम इतनी चुप क्यों हो?”
“तुम्हारे मन में क्या चल रहा है?”

लेकिन ऐसे सवाल कभी नहीं आए।
शायद उसे यक़ीन था कि नायरा हमेशा समझ जाएगी। हमेशा उसकी परिस्थितियों को स्वीकार कर लेगी। हमेशा इंतज़ार कर लेगी।
और नायरा करती भी रही।
क्योंकि प्रेम में वह हारना नहीं चाहती थी।
लेकिन धीरे-धीरे उसे महसूस होने लगा कि यह प्रेम नहीं, उसकी सहनशीलता की परीक्षा बनता जा रहा है।
वह टूट रही थी, मगर आवाज़ नहीं कर रही थी।
वह रो रही थी, मगर किसी को दिखा नहीं रही थी।
वह अकेली थी, मगर किसी से कह नहीं रही थी।
क्योंकि उसे सहानुभूति नहीं चाहिए थी।
उसे किसी की मजबूरी में दिया गया साथ भी नहीं चाहिए था।
वह किसी के जीवन पर बोझ बनना नहीं चाहती थी।
उसे सिर्फ़ इतना चाहिए था कि विराज अपनी इच्छा से उसका हाथ थामे।
अपनी इच्छा से उसके मन की ओर आए।
अपनी इच्छा से उसके भीतर छिपे दर्द को महसूस करे।
मगर प्रेम माँगकर नहीं लिया जाता।
और नायरा माँगना नहीं जानती थी।
एक दिन उसने महसूस किया कि वह जिस बात का वर्षों से इंतज़ार कर रही थी, शायद वह कभी होने वाली ही नहीं थी।
उसने हमेशा सोचा था कि सच्चा प्रेम बिना कहे समझ लेता है।
लेकिन जीवन ने उसे एक अलग सच सिखाया।
सच यह था कि कोई भी इंसान किसी दूसरे के मन की पूरी कहानी नहीं पढ़ सकता।
हमारी खामोशियाँ उतनी स्पष्ट नहीं होतीं, जितना हम सोचते हैं।
हमारे अनकहे शब्द उतने सुनाई नहीं देते, जितना हम महसूस करते हैं।
हम अक्सर उम्मीद कर लेते हैं कि सामने वाला सब समझ जाएगा।
लेकिन वह कैसे समझेगा, जब हमने कभी कहा ही नहीं?
उस रात नायरा बहुत देर तक खिड़की के पास बैठी रही।
आसमान में चाँद था और उसकी आँखों में नमी।
उसने पहली बार अपने दिल को समझाया कि कुछ लोग बुरे नहीं होते, बस वे हमारी भाषा नहीं समझ पाते।
कुछ रिश्ते अधूरे इसलिए नहीं रह जाते कि उनमें प्रेम कम था।
वे इसलिए अधूरे रह जाते हैं, क्योंकि एक दिल बोल नहीं पाता और दूसरा दिल सुन नहीं पाता।
उसकी आँखों से एक आँसू गिरा और होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आ गई।
शायद स्वीकार करना भी प्रेम का एक रूप होता है।
उसने मन ही मन कहा—
“काश तुम मेरी खामोशी पढ़ पाते।
काश तुम समझ पाते कि मुझे तुम्हारे समय से ज़्यादा तुम्हारा एहसास चाहिए था।
काश तुम जान पाते कि मैं तुम्हारे साथ की भीख नहीं माँग रही थी।
मैं तो बस इतना चाहती थी कि तुम अपनी इच्छा से मेरे पास आओ, मेरे दिल तक पहुँचो और मुझे महसूस करो।”
लेकिन कुछ इच्छाएँ पूरी नहीं होतीं।
वे बस दिल के किसी कोने में चुपचाप रह जाती हैं।
बिल्कुल उन अनकहे शब्दों की तरह…
जो कभी कहे नहीं गए,
और इसलिए कभी सुने भी नहीं गए।
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