
सुप्रसन्ना
तुम्हें तन्हाइयों से डर लगता था,
इसलिए मेरा साथ तुम्हें प्रिय था।
मेरे होने से
भीगी-भीगी बारिशें और भी सुहानी लगती थीं,
सुबह जैसे खुशनुमा हवा का झोंका
तुम्हें छूकर गुज़र जाता था,
और शाम कुछ यूँ संवरी-संवरी सी लगती थी,
मानो आसमाँ में
किसी ने सतरंगी इंद्रधनुष उकेर दिया हो।
तुमने मुझे शिद्दत से चाहा,
तुम्हारी चाहत में
किसी और की ख़्वाहिश नहीं थी।
तुम्हें मुझसे और कुछ नहीं चाहिए था,
बस मेरा होना ही
तुम्हारे लिए काफ़ी था।
मैं तुम्हारी दुनिया का
सबसे ख़ूबसूरत हिस्सा थी,
मेरी मौजूदगी में
तुम अपनी दुनिया को
मुकम्मल पाते थे।
मेरे साथ होने से
तुम्हारी ज़िंदगी में रौनक उतर आती थी,
मौसमों की कीमत बढ़ जाती थी,
ख़ामोशियाँ भी गुनगुनाने लगती थीं,
और साधारण-से दिन भी
तुम्हारी साँसों को महका जाते थे।
शायद प्रेम यही तो है
मेरा होना ही
तुम्हारी ज़िंदगी का
सबसे बड़ा ख़ूबसूरत हिस्सा होना।
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