
ममता सिंह देवा
आम आदमी कितना आम-सा शब्द है,
यही आम आदमी करता सबको निशब्द है।
सब खास अपनी खास जिम्मेदारियाँ निभाते हैं,
आम आदमी तो हम सबकी गाँठें सुलझाते हैं।
इनके लिए तुम-मैं कोई मायने नहीं रखते,
ये तो सबको अपना समझकर अपना ही करते।
कितना मुश्किल है आम होकर खास करना,
और फिर खास करके भी आम बने रहना।
ये किसी पद-सम्मान के भूखे नहीं होते,
दिल से मुलायम होते हैं, रूखे नहीं होते।
इनकी मुलायमियत का मत उठाना गलत फायदा,
वरना ये तोड़ देंगे फिर हर कानून-कायदा।
ये प्रेम और सम्मान की भाषा जानते हैं,
हर निराशा को भी आशा ही मानते हैं।
यही आशा इनके आम होने की पहचान है,
इसी के बल पर इनकी आन, बान और शान है।
इस आम आदमी का बड़प्पन तो देखिए,
जनाब! इसके हौसले से कुछ तो सीखिए।
हर विपत्ति में ये डटकर खड़ा रहता है,
कुछ भी हो जाए, ये हाथ नहीं छोड़ता है।
इतना सब होने के बावजूद ये खास नहीं होना चाहता,
ये आम था, आम है और आम ही रहना चाहता है।
क्योंकि असली बड़प्पन अक्सर सादगी में रहता है,
और आम आदमी ही दुनिया को खास बनाता है।

ह्रदय से आभार 🙏
वाह बहुत शानदार सृजन 👌🌹
हृदय से आभार 😊