दोस्त

स्कूल यूनिफॉर्म पहने चार दोस्त कंधे से कंधा मिलाकर हँसते हुए स्कूल की ओर जाते हुए, जो बचपन की सच्ची दोस्ती और यादों का प्रतीक हैं।

श्वेता सिंह, मुंबई

वो बचपन की पाठशाला भूले न मुझे भुलाए,
बचपन के वो मेरे दोस्त, जो आज मुझे बहुत याद आए।

बैग उठाकर, हाथ पकड़कर,
चलो सभी, सब सड़क पर;
एक डगर थी, एक दिशा थी,
अपने लक्ष्य को पाने की।

प्रार्थना जब भी होती थी,
हम सब सरस्वती वंदना गाते थे।
एक को छोड़कर बाकी सबको,
भाई-बहन बनाते थे।

दोस्तों को देखकर हम,
मन ही मन मुस्काते थे।
दोस्त वही, जो सच्चे थे,
मन में द्वेष न पालते थे।

न एक-दूसरे से हम,
नंबर की होड़ लगाते थे।
जो भी, जिसको मिले नंबर,
हम उसी में खुश हो जाते थे।

ना ही अब बचपन रहा,
ना ही उन दोस्तों का साथ।
अब आई है युवा अवस्था,
दोस्त नए बनाएँगे।

छूट गई वो बचपन की टोली,
भूले नहीं, भूल पाएँगे।
दोस्त चार अब खास हुए,
एक धागे में गुंथ जाएँगे।

हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई—
धर्म को कभी न लाएँगे।
दोस्त सच्चे हैं हमारे,
इनको न भूल पाएँगे।

कौन क्या टिफ़िन में लाया,
हम सब मिलकर खाएँगे।
खाना खाया ऐसे मानो,
जैसे कभी न खाया था।

आज जाकर अचार का मज़ा,
बहुत ही याद आया था।

जब हम देते इम्तिहान,
पास हमारे बैठे वो।
न आने पर उत्तर मुझको,
कॉपी पीछे कर देते वो।

पेन में मेरे इंक ख़त्म हो,
झट से अपना देते वो।
एक को पानी पीना हो तो,
चारों साथ में जाते थे।

पानी पीना होता नहीं था,
फिर भी घूम-घाम कर आते थे।
एक-दूसरे पर इल्ज़ाम लगे तो,
चारों उसे बचाते थे।

“नहीं किया है कुछ भी उसने”,
सबको हम समझाते थे।

एक-एक कर दूर हुए,
मुझे याद बहुत वो आते हैं।
साथ रहा न उनका अब,
फिर भी मन को भाते हैं।

वीडियो कॉल करो तो उनको,
चारों बकबक करते हैं।
समझ में न आए किसी की बात,
फिर भी चारों हँसते हैं।

बचपन बीता, गई जवानी,
यादों में वो अब भी हैं।
बुढ़ापे में जो खुशी देंगे,
चेहरे की वही रौनक हैं।

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