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​खामोश शिल्पकार : दिनेश लाड

द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित क्रिकेट कोच दिनेश लाड, रोहित शर्मा के गुरु और भारतीय क्रिकेट की नई प्रतिभाओं को प्रशिक्षित करते हुए।

जहाँ दुनिया चमकते सितारों को देखती है, वहीं पर्दे के पीछे रहकर भारतीय क्रिकेट की नई इबारत लिखने वाले आधुनिक द्रोणाचार्य से लाइव वॉयर न्यूज के लिए मुंबई से मधु चौधरी की खास बातचीत-

मधु चौधरी, मुंबई

सिने जगत के बाद क्रिकेट की चकाचौंध से हम सभी परिचित हैं ,जहां हर कोई सफलता और प्रसिद्धि की चोटी पर दिखना चाहता है, वहीं कुछ ऐसी शख्सियतें भी हैं , जो खुद को नेपथ्य (पर्दे के पीछे) में रखकर देश के भविष्य को आकार देती हैं। ऐसे ही एक महान व्यक्तित्व है दिनेश लाड.

​मुंबई की मिट्टी में जन्मे और यहीअपनी कर्मभूमि बनाने वाले दिनेश जी का जीवन खुद में संघर्ष और समर्पण की एक बेमिसाल कहानी है। जीवन में आर्थिक विषमताओं का सामना करते हुए, उन्होंने कोलगेट और फिर भारतीय रेलवे में 39 वर्षों तक निष्ठापूर्वक सेवा की और वहाँ से सेवानिवृत्त हुए। लेकिन उनका असली सफर और जुनून क्रिकेट के मैदान पर शुरू होता है।
​द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित दिनेश लाड पिछले 30 वर्षों से ‘स्वामी विवेकानंद इंटरनेशनल स्कूल’ में बच्चों को निशुल्क क्रिकेट कोचिंग दे रहे हैं। आज जहाँ खेल अकादमियाँ व्यावसायिकता का केंद्र बन चुकी हैं और प्रतिभा को निखारने के लिए लाखों-करोड़ों की फीस वसूली जाती है, वहीं दिनेश जी ने पैसे के बजाय देश के लिए ‘कोहिनूर’ तराशने को अपना धर्म माना। रोहित शर्मा और शार्दुल ठाकुर , हरमीत सिंह, आतिफ, सिद्धेश, जैसे सितारों को दुनिया के सामने लाने का श्रेय उन्हीं को जाता है।


दिनेश जी ने यह संस्कार अपने महान गुरु, आदरणीय रमाकांत आचरेकर सर से पाए हैं। आचरेकर सर ने जिस तरह दिनेश जी के बचपन के संघर्षों और आर्थिक कठिनाइयों को समझते हुए उनकी मदद की थी, उसी सीख को आगे बढ़ाते हुए दिनेश जी आज भी बच्चों को मुफ्त कोचिंग दे रहे हैं। समर्पण की पराकाष्ठा देखिए कि उन्होंने 22 होनहार बच्चों को गोद लिया है, जिनकी पढ़ाई, रहने और क्रिकेट का सारा खर्च वह स्वयं उठाते हैं।
​आज वह अपनी अकादमी “दिनेश लाड क्रिकेट फाउंडेशन” के जरिए बिना किसी प्रचार के, खामोशी से भारतीय क्रिकेट की अगली पीढ़ी तैयार कर रहे हैं। ​
साक्षात्कारकर्ता ( मधु चौधरी ) सर, सबसे पहले आपके इस सफर के शुरुआती दिनों के बारे में जानना चाहेंगे। आपने अपने क्रिकेट की कोचिंग किनसे ली और उस दौर में आपका अनुभव कैसा रहा?
​दिनेश लाड: मेरी आर्थिक परिस्थितियां बिल्कुल अच्छी नहीं थीं। उस कठिन दौर में मैं रमाकांत अचारेकर सर के पास पहुंचा। उन्होंने मेरी बहुत मदद की और मुझे क्रिकेट सिखाया। अचारेकर सर से मैंने न केवल क्रिकेट की बारीकियां सीखीं, बल्कि उनसे मानवीयता का सबसे बड़ा सबक भी सीखा, जिसे मैं आज तक निभा रहा हूं। यही कारण है कि मैंने भी हमेशा आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को क्रिकेट सिखाया और उनके कठिन वक्त में उन्हें पूरा सहारा दिया।

प्रश्न- भारतीय टीम के कप्तान रोहित शर्मा को आज पूरी दुनिया ‘हिटमैन’ के नाम से जानती है। आप रोहित से पहली बार कब मिले और क्या पहली ही नजर में आपको उनका वह स्पेशल टैलेंट नजर आ गया था?
​दिनेश लाड: यह 1999 की बात है, जब मैंने रोहित को पहली बार एक मैच खेलते हुए देखा था। तब रोहित सिर्फ 12 साल का था। उसका खेल देखकर मुझे तुरंत लग गया कि यह लड़का बहुत आगे जा सकता है और बहुत अच्छा खेल सकता है। मैंने उसे अपने पास बुलाया और अपने स्कूल में कोचिंग ज्वाइन करने के लिए कहा। इस पर रोहित ने बेहद मासूमियत से कहा कि उसके पास कोचिंग की फीस देने के लिए पैसे नहीं हैं। तब मैंने पहली बार स्कूल के डायरेक्टर से बात करके रोहित के लिए ‘फ्री-शिप’ (मुफ्त शिक्षा व कोचिंग) मांगी। वहां से रोहित की कोचिंग की शुरुआत हुई। मैं तो रोहित को अपने घर पर रखने के लिए भी तैयार था, लेकिन उसकी दादी ने इसके लिए इंकार कर दिया था।

प्रश्न- आप स्वयं भी रेलवे के लिए क्रिकेट खेलते थे। आपको पहली बार ऐसा कब महसूस हुआ कि आप बच्चों को कोचिंग दे सकते हैं? क्योंकि खिलाड़ी होना और एक कोच होना, दोनों अलग बातें हैं।
​दिनेश लाड:
सच कहूं तो मुझे अंदाजा ही नहीं था कि मैं बच्चों को सिखा सकता हूं या कोचिंग कैसे की जाती है। रेलवे के मेरे एक दोस्त ने मुझे गोरेगांव के प्रबोधन ग्राउंड पर डेढ़ महीने के वेकेशन बैच में कोचिंग देने के लिए कहा, और मैं तैयार हो गया। उस समय वहां कुल मिलाकर 18 कोच थे। कैंप के आखिरी दिन मुझे बुलाया गया और रेगुलर कोच बनने का ऑफर दिया गया।
​चूंकि मैं रेलवे के स्पोर्ट्स कोटा के तहत नौकरी पर था, तो मुझे वहां से हाफ-डे (आधे दिन की छुट्टी) मिल जाता था। तब मैंने प्रबोधन ग्राउंड पर आकर बच्चों को कोचिंग देना शुरू किया। इसके बाद मैंने स्वामी विवेकानंद स्कूल (दहिसर) में भी कोचिंग देना शुरू किया। आपको जानकर हैरानी होगी कि मैंने वहां से आज के दिन तक कोचिंग के लिए एक भी पैसा नहीं लिया है। पिछले 30 वर्षों से मैं बच्चों को वहां बिल्कुल निशुल्क (Free) कोचिंग दे रहा हूं।

प्रश्न-इसी नि:स्वार्थ भाव से आपने शार्दुल ठाकुर को भी तराशा। उनसे जुड़ी यादें और आपके परिवार के सहयोग के बारे में कुछ बताइए?
​दिनेश लाड:
हां, शार्दुल ठाकुर से जब मैं मिला, तो मैं उसे सिखाना चाहता था। लेकिन उसके माता-पिता ने बताया कि वे पालघर में रहते हैं और वहां से रोज दहिसर आकर 5 घंटे की ट्रेनिंग दिलाना उनके लिए व्यावहारिक रूप से संभव नहीं था। तब मैंने उनके माता-पिता से कहा कि मैं शार्दुल को अपने घर पर रखूंगा और उसकी पढ़ाई व क्रिकेट दोनों की जिम्मेदारी संभालूंगा। उसके साथ ही आतिफ अत्तरवाला जो बोयस्सर से था वह दोनों एक साथ ही आए थे, शार्दुल एक साल रहा और आतिफ 5 साल मेरे साथ मेरे अपने बच्चों की तरह रहा। मेरा बेटा सिद्धेश , आतिफ, शार्दुल और रोहित—ये सब साथ में ही खेले हैं।
​इस पूरे सफर का श्रेय मेरी पत्नी दीपाली को जाता है। उसने इन बच्चों को अपने बच्चों की तरह ही प्यार दिया। उन्हें अपने घर में भी स्थान दिया और दिल में भी। उसने कभी भी मुझसे यह शिकायत नहीं की कि “तुम बच्चों को सिखाने के लिए फीस क्यों नहीं लेते हो?”

प्रश्न-: सर, आपका जीवन कई उतार-चढ़ावों से भरा रहा है। अपने जीवन के कुछ ऐसे अनुभव हमारे साथ साझा कीजिए जिन्होंने आपकी सोच बदल दी?
​दिनेश लाड:
बात 1982 की है, जब मैं रेलवे में क्रिकेट खेलना चाहता था। तब मेरे पास मेडिकल टेस्ट कराने के लिए ₹11 भी नहीं थे। उस वक्त मनोहर सुर्वे सर ने मुझे ₹11 दिए और कहा, “जा, अपना मेडिकल करा और खेल।” अचारेकर सर और सुर्वे सर ने जिस तरह मेरी मदद की, उससे मैंने जीवन का यह सबक सीखा कि पैसा उतना जरूरी नहीं है। अगर आप दूसरों की मदद करते हैं, तो भगवान आपके लिए खुद रास्ते खोलता जाता है। रोहित शर्मा जैसा खिलाड़ी भी भगवान ने ही मेरे पास भेजा था।
​एक समय अपने आर्थिक संघर्षों से टूटकर मैंने आत्महत्या तक का मन बना लिया था। लेकिन भगवान ने वहां भी मेरी उंगली थामी, मुझे हिम्मत दी। उस दिन के बाद मैंने कभी पलटकर नहीं देखा। मेरे सब काम अपने आप होते गए, कैसे हुए—यह मैं भी नहीं जानता। मैंने पैसे के बजाय अपने बेटे सिद्धेश (जो रणजी ट्रॉफी का कप्तान बना ) को अपना समय दिया। आज सिद्धेश को मुंबई का क्राइसिस मैन कहा जाता है, इसलिए मैं सभी से कहना चाहता हूं कि ईश्वर से यदि मानव जन्म मिला है, तो सिर्फ पैसे के पीछे भागना सही नहीं है।

​प्रश्न- रोहित शर्मा अक्सर आपकी सलाह और अनुशासन का जिक्र करते हैं। एक कोच के रूप में क्या आप सिर्फ तकनीक पर ध्यान देते थे या उनके मानसिक दृष्टिकोण (Mental Approach) को भी आकार देते थे?
​दिनेश लाड:
कोई भी खेल हो या शिक्षा, सबसे जरूरी अनुशासन होता है। मैं तकनीक तो सिखाता ही था, साथ ही रोहित से हमेशा कहता था कि केवल निरंतर प्रैक्टिस से ही खेल में उत्कृष्ट प्रदर्शन संभव है। रोहित का खेल हमेशा से ही गॉड-गिफ्टेड और अच्छा था। बच्चे अपनी योग्यता से आगे बढ़ते हैं, मैं तो सिर्फ उन्हें सही दिशा दिखाने का काम करता हूं। टैलेंट उनका अपना ही काम आता है। रोहित अपने लक्ष्य को लेकर हमेशा बहुत कॉन्फिडेंट था।
​जब रोहित अंडर-19 वर्ल्ड कप खेल कर आया था, उसके बाद 2006 में मैंने एक इंटरव्यू में कहा था कि “रोहित अभी 2 साल डोमेस्टिक (घरेलू) क्रिकेट खेलेगा और फिर इंटरनेशनल खेलेगा।” यह मेरा विजन था, जो आगे चलकर बिल्कुल सार्थक हुआ।

​प्रश्न-आज रोहित दुनिया के सबसे बेहतरीन और सफल कप्तानों में गिने जाते हैं। क्या बचपन में भी आपको उनमें नेतृत्व (Leadership) के गुण दिखाई देते थे?
​दिनेश लाड:
हां, रोहित में कप्तानी के गुण शुरुआत से ही थे। रोहित का सबसे बड़ा प्लस पॉइंट यह है कि वह अपने खिलाड़ियों पर बहुत भरोसा करता है। वह उन्हें यह विश्वास दिलाता है कि “तू ही मेरा सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी है।” किस खिलाड़ी के अंदर कौन सा गुण सबसे अच्छा है, उसे मैदान पर सही समय पर कैसे इस्तेमाल करना है, और खिलाड़ी का मनोबल कैसे बढ़ाए रखना है, रोहित का यही गुण उसे एक अच्छा कप्तान बनाता है।

प्रश्न- क्या कभी ऐसा दौर भी आया जब रोहित अपनी उपलब्धियों या प्रदर्शन से निराश हुए हों और आपको उन्हें सही रास्ता दिखाना पड़ा हो?
​दिनेश लाड:
हां, 2007 से 2009 के बीच रोहित बांद्रा शिफ्ट हो गया था। तब वह कुछ समय के लिए उतनी मेहनत नहीं कर रहा था जितनी उसे करनी चाहिए थी। इसका परिणाम यह हुआ कि 2011 के वर्ल्ड कप की भारतीय टीम में उसका चयन नहीं हुआ। वह बहुत निराश होकर मेरे पास आया और कहा, “सर, मेरा सिलेक्शन होना चाहिए था।”
​तब मैंने उसे सीधे शब्दों में समझाया और पूछा, “क्या तुम सच में क्रिकेट को उतना समय दे रहे हो, जितना जरूरी है?” तब रोहित को अपनी गलती का एहसास हुआ। उस दिन के बाद से रोहित ने जो मेहनत शुरू की, उसके बाद उसका ग्राफ हमेशा ऊपर ही बढ़ता गया।

​प्रश्न-एक गुरु के रूप में आपके जीवन का सबसे गर्व का पल कौन सा था?
​दिनेश लाड:
जब रोहित शर्मा ने पहली बार भारतीय टीम की नीली जर्सी पहनी, वह पल मेरे जीवन का सबसे ज्यादा खुशी और गर्व से भरा हुआ पल था।

प्रश्न-आप निशुल्क कोचिंग देकर देश की सेवा तो कर ही रहे हैं, इसके अलावा वर्तमान में आप किस मिशन पर काम कर रहे हैं?
​दिनेश लाड:
वर्तमान में, मैं ‘दिनेश लाड क्रिकेट फाउंडेशन’ चला रहा हूं। इसके अंतर्गत मैंने शिर्डी, सोलापुर, बदलापुर, नडियाद, संभाजी नगर, रत्नागिरी जैसी अलग-अलग जगहों से 22 बच्चों को अडॉप्ट (गोद) किया है। ये सभी बच्चे 10 से 12 साल की उम्र के हैं। मैं खुद उनके रहने की व्यवस्था करता हूं, उनकी पढ़ाई का पूरा खर्चा उठाता हूं और उन्हें क्रिकेट सिखाता हूं। सरकार की तरफ से हमें सिर्फ खेलने के लिए ग्राउंड मिला है, बाकी इन बच्चों की परवरिश और ट्रेनिंग का सारा खर्च मैं और मेरा बेटा सिद्धेश लाड मिलकर उठा रहे हैं। हमारा उद्देश्य यही है कि पैसों की कमी के कारण देश का कोई टैलेंट पीछे न छूट जाए। ​ खेल और मानवता के प्रति आपका यह समर्पण वाकई प्रशंसनीय है। हमसे बात करने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद!

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4 thoughts on “​खामोश शिल्पकार : दिनेश लाड”

    1. :”बहुत ही प्रेरणादायक लेख! आपकी लेखनी ने तो लाट सर के व्यक्तित्व को बहुत अच्छे से उजागर किया ही, साथ ही उनके द्वारा निस्वार्थ भाव से की गई समाज सेवा समाज को एक नई दिशा भी देती है।”

  1. ऐसे गुरुओं को दिल से सलाम यह जो अपने शिष्यों के लिए कर रहे हैं बहुत कम लोग कर सकते हैं 🙏🏼

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