
सुरेश परिहार, पुणे
रात के लगभग ग्यारह बज रहे थे। शहर की सड़कों पर सन्नाटा उतरने लगा था, लेकिन राघव और रिद्धिमा की बातें अभी भी बह रही थीं। मोबाइल की स्क्रीन पर चल रही वह कॉल पिछले तीन घंटे से जारी थी।
उन्होंने मौसम से लेकर सपनों तक, बचपन की शरारतों से लेकर आने वाले कल की उम्मीदों तक न जाने कितनी बातें कर ली थीं। दोनों के बीच का रिश्ता ऐसा था, जिसे कोई नाम देना मुश्किल था, लेकिन उसकी गहराई को महसूस करना बहुत आसान।
“तुम्हें पता है,” रिद्धिमा धीमे स्वर में बोली, “आज पूरा दिन बहुत थकाने वाला था। लेकिन तुमसे बात करके लगता है जैसे सारी थकान कहीं गायब हो गई।”
राघव मुस्कुराया।
“और मुझे लगता है जैसे मेरी आधी ज़िंदगी तुम्हारी बातें सुनते-सुनते ही निकल सकती है।”
रिद्धिमा हँस पड़ी।
कुछ पल दोनों चुप रहे। वह चुप्पी भी बातों से भरी हुई थी।
फिर राघव ने घड़ी की तरफ देखा।
“अच्छा रिद्धिमा, अब मुझे चलना चाहिए। सुबह जल्दी उठना है।”
यह सुनकर रिद्धिमा के चेहरे की मुस्कान थोड़ी धीमी पड़ गई।
“हम्म…”
“तो फिर… बाय।”
जैसे ही यह शब्द राघव के होंठों से निकला, दूसरी तरफ कुछ सेकंड की खामोशी छा गई।
“क्या हुआ?” राघव ने पूछा।
रिद्धिमा ने धीरे से कहा,
“तुम मुझे बाय मत कहा करो।”
राघव चौंक गया।
“क्यों? इसमें क्या हुआ?”
रिद्धिमा कुछ क्षण चुप रही। फिर उसकी आवाज़ पहले से कहीं ज़्यादा नरम हो गई।
“पता नहीं… लेकिन मुझे यह शब्द अच्छा नहीं लगता।”
“लेकिन बाय तो सब कहते हैं।”
“हाँ, सब कहते हैं। लेकिन तुम सब नहीं हो।”
राघव के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।
“अच्छा… तो इतनी-सी बात है?”
“नहीं, इतनी-सी नहीं है।”
रिद्धिमा की आवाज़ अब भावनाओं से भीग चुकी थी।
“जब कोई बाय कहता है न, तो लगता है जैसे वह उस पल को खत्म कर रहा है। जैसे बातचीत यहीं खत्म, एहसास यहीं खत्म। मुझे हमेशा लगता है कि बाय के साथ थोड़ा-सा खालीपन भी आ जाता है।”
राघव चुपचाप सुनता रहा।
“मुझे विदाइयाँ कभी पसंद नहीं रहीं। शायद इसलिए क्योंकि ज़िंदगी ने कई लोगों को बाय कहते हुए हमेशा के लिए दूर जाते देखा है।”
उसकी बात सुनकर राघव का दिल भर आया।
“तो फिर मैं क्या कहूँ?”
रिद्धिमा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
“कुछ ऐसा कहो, जिसमें अगली मुलाकात की उम्मीद हो। ऐसा लगे कि तुम जा नहीं रहे, बस थोड़ी देर के लिए रुक रहे हो।”
“जैसे?”
“जैसे… ‘फिर बात करेंगे’… ‘अपना ख्याल रखना’… ‘जल्दी मिलते हैं’… या सिर्फ इतना कि ‘मैं यहीं हूँ’।”
राघव की आँखें नम हो गईं।
उसे पहली बार समझ आया कि रिद्धिमा को शब्दों से नहीं, उनके पीछे छिपे एहसासों से प्रेम था।
वह बोला,
“जानती हो, मैंने कभी सोचा ही नहीं था कि एक छोटा-सा शब्द किसी के दिल को इतना छू सकता है।”
रिद्धिमा मुस्कुरा दी।
“क्योंकि मेरे लिए तुम कोई बातचीत नहीं हो, जो खत्म हो जाए। तुम मेरी आदत हो। और आदतों को बाय नहीं कहा जाता।”
राघव ने आँखें बंद कर लीं।
उस एक वाक्य ने उसके दिल में हमेशा के लिए जगह बना ली।
कुछ क्षण बाद उसने बहुत धीरे से कहा,
“ठीक है, आज के बाद कभी बाय नहीं कहूँगा।”
“पक्का?”
“पक्का।”
“तो अब क्या कहोगे?”
राघव मुस्कुराया।
“मैं कहूँगा… अपना ख्याल रखना। और हाँ, कल फिर मिलते हैं।”
रिद्धिमा की आँखों में चमक आ गई।
“बस… यही सुनना चाहती थी।”
कॉल खत्म होने से पहले दोनों कुछ सेकंड चुप रहे।
फिर राघव ने कहा,
“याद रखना, कुछ रिश्ते दरवाज़े बंद नहीं करते। वे बस अगली मुलाकात तक खिड़की खुली छोड़ देते हैं।”
रिद्धिमा मुस्कुराई।
“और हमारा रिश्ता भी ऐसा ही है।”
उस रात पहली बार उनकी बातचीत बिना “बाय” के खत्म हुई।
क्योंकि कुछ लोग हमारी ज़िंदगी से जाते नहीं हैं।
वे बस अगली बात, अगली मुस्कान और अगली मुलाकात तक हमारे दिल में ठहर जाते हैं।
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बेहद भावपूर्ण मर्मस्पर्शी कहानी❤️❤️