किसे गुनहगार कहें

धुंधले शहर की पृष्ठभूमि में अकेला शायर, न्याय के तराज़ू और बिखरे हुए मुखौटों का प्रतीकात्मक दृश्य

दोलन रॉय, संभाजीनगर

किसे गुनहगार कहें, किसे पाक कहें,
इस शहर-ए-बाज़ार में किसे ख़ाक कहें।

हर एक चेहरा यहाँ बिकने को तैयार मिला,
फिर किस ज़माने को हम बेबाक कहें।

तुझे भी कटघरे में खड़ा देखा जब,
किसे फिर अद्ल का हम सरपरस्त कहें।

हम आज बच तो गए इल्ज़ाम की आँधी से,
मगर ये सोच रहे हैं, इसे इत्तिफ़ाक़ कहें।

झूठ के ज़ेवरों से जो सजते रहे लोग,
उन्हें कामयाब कहें या उन्हें हलाक कहें।

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