नीम के पेड़ से झाँकता हुआ चाँद

नीम के पेड़ से झाँकता हुआ चाँद

श्वेता सिंह, मुंबई

नीम के पेड़ से झाँकता हुआ चाँद
मेरी चारपाई को देख रहा था।
मैं उस चारपाई पर लेटी न जाने
किन ख़यालों में खोई हुई थी।
चाँद को देखकर मैं हल्का-सा मुस्कुराने लगी।

जून का महीना था। गर्मी अपनी पराकाष्ठा पर थी।
बिजली और हवा का कहीं अता-पता नहीं था।
मानो गर्मी मेरे शरीर को बार-बार नहला रही हो।
भीगे हुए बदन के साथ मैं चाँद को देखकर मुस्कुराए जा रही थी,
मानो उसे गुज़रे वर्षों का हाल सुनाए जा रही हूँ।

मेरी शादी भी जून के महीने में ही हुई थी।
बात कुछ बीते दिनों की है, जब मैं उस घर की नई-नवेली दुल्हन हुआ करती थी।
कुछ डरी, कुछ सहमी,
घर की दहलीज़ तक न पार करने वाली।

और आज…
मैं उसी घर के दरवाज़े पर चारपाई पर लेटी
उस चाँद को निहार रही हूँ।
उसे अपने और उसके बीच के गुज़रे वर्षों का रिश्ता समझा रही हूँ।

तुम तो वैसे ही दिखते हो,
पर मेरी सूरत बदल गई है।
तुम्हारे और मेरे बीच की अब दूरी भी समाप्त हो गई है।
रिश्तों में मैं अब दो कदम आगे बढ़ गई हूँ।
जो स्थान कभी मेरी सास का था,
आज वहाँ मैं स्वयं खड़ी हूँ।

जो चाँद कभी उनकी बैठक में झाँकता था,
वह अब मेरी चारपाई का हिस्सा बन गया है।
मुद्दतें बीतती जा रही हैं,
न जाने कौन-कौन इस घर से विदा हो गया।

फिर वही जून की गर्मी थी।
मैं चारपाई पर लेटी न जाने
कितनी ही बातें अपने मन में दोहराए जा रही थी।
कई वर्षों का सफ़र
मैंने कुछ ही मिनटों में तय कर लिया था।

चाँद वही है,
घर वही है,
बस सीढ़ियाँ बदल रही हैं।

न जाने कितने वर्षों से
पीढ़ियाँ बदलती चली जा रही हैं…
और चाँद हर पीढ़ी का मौन साक्षी बना
आज भी वहीं खड़ा है।

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