गुज़ारिश

चाँदनी रात में खिड़की के पास चिंतन में बैठी एक महिला के सामने स्वप्न में प्रकट हुआ एक प्राचीन भारतीय बादशाह, जिसकी शांत मुद्रा अतीत से सीख लेकर वर्तमान और भविष्य की ओर बढ़ने का संदेश देती है।

किश्वर अंजुम, भिलाई

गुज़ारिश

गुज़िश्ता दौर के एक बादशाह,
कल आए ख़्वाब में,
वो कहने लगे, किश्वर बेगम!
हो किस मलाल में।

न सोती चैन से,
रतजगा मामूल किया है,
क्यों खोद रही माज़ी,
दिल यूं रंजूर किया है।

न बेवजह की फ़िक्र करो,
मुस्तक़बिल देखो,
कि जो वजूद में नहीं है,
न वो मुश्किल देखो।

सुधार सको तो सुधारो,
जो हाल है बिगड़ा,
क्यों बीती बातों में उलझ कर
बवाल करती हो खड़ा।

मैं हूं गुज़रा हुआ एक वक़्त,
मुझसे रश्क़ न करो,
मुझे भुला दो,
बर्बाद अपनी पुश्त न करो।

हमेशा मेरे ज़माने की गलतियों
को देखतीं,
तुम्हें ये क्यों नहीं लगता,
वो दौर तो था क़दीमी।

वो ज़माना था ज़ोर-आवरी,
जम्हूरियत न थी,
अवाम कह सके सब कुछ,
उसे सहूलियत न थी।

मेरे ज़माने को,
आज कसौटी में न कसो,
अभी का वक्त अलग है,
नई नज़र से ये देखो।

पुराना था ज़माना,
और पुरानी थी रवायत,
हर वक्त के तरीक़े हमेशा ही
होते हैं अलग।

उलझतीं बीती बातों में,
ज़हन उलझाती हो अपना,
अरे! सो जाओ चैन से,
न देखो मेरा अब सपना।

मुझे तुम लाख दोष दो,
मेरा वक्त बदलेगा नहीं,
कि जो मादूम है,
अब कभी वो सुधरेगा नहीं।

न करो वक्त को बर्बाद
मुझे सोच-सोच कर,
न उखाड़ो गड़े मुर्दे,
कबर को खोद-खोद कर।

ज़रा सोचो कि बरसों पहले,
राज जो किया हमने,
क्या बदल पाओगी उसे आज,
तो फिर क्यों सोचतीं फ़ित्ने,

तुम अपने ज़माने में जिओ,
हमको और न सोचो,
न हमसे रंजिशें रखो,
जो रोक सको तो रोको।

क्या बदल पाओगी तुम,
मेरी बादशाहत का सच,
तो तुम्हारी नींद उजड़ जाए,
क्यों करती हो ये हरकत।

मुझे अफ़सोस होता है,
मुझे यूं याद करती हो,
सवालों में उलझतीं,
सारी शब पहलू बदलती हो।

ख़ुदा ने तय किया था जो भी,
हुआ है वो, वही होगा,
तुम अपने कर्म करो,
अब तो बेहतर यही होगा।

कि भूत को भविष्य पर
न छाने देना,
रोशनी की किरणों को
ज़हन में आने देना।

मुझे मदफ़न के अंधेरों से न
जगाया यूं करो,
न मुझे याद करो,
मेरे पास आया न करो…

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