
मौसमी चंद्रा, पटना
स्वरा! एक ऑनलाइन पत्रिका में संपादक थी।
दिन भर दर्जनों ईमेल आते। कुछ बेहद ज़रूरी होते, कुछ कम ज़रूरी और कुछ ऐसे, जो सीधे स्पैम फ़ोल्डर में जाते।
“मैडम, बस दो मिनट…”
“एक मौका दे दीजिए…”
“आप जैसी महान संपादिका और लेखिका…”
“मैम, क्या आपका फोन नंबर मिल सकता है?”
“मैम, ग़ज़ब खूबसूरत लगती हैं आप! ब्यूटी विद ब्रेन…”
ब्ला… ब्ला…
वह मुस्कुराकर अधिकांश संदेश बिना खोले ही स्पैम फ़ोल्डर में डाल देती। ऐसे संदेशों का जवाब देना अपने समय को बर्बाद करना था।
लेकिन विडंबना यह थी कि मोबाइल में तो उसने स्पैम फ़िल्टर लगा रखा था, जीवन में नहीं। उसके जीवन में भी कुछ लोग ऐसे ही थे, इन गैरज़रूरी संदेशों की तरह।
अंशुल उन्हीं में से एक था।
हर तीसरे दिन उसका संदेश आ जाता—
“हाय, कैसी हो?”
“आज तुम्हारी याद आई…!”
“यार, तुम तो बदल गई हो! नो मैसेज, नो कॉल!”
स्वरा जवाब दे देती, तो अगले ही क्षण उसका कॉल आ जाता। फिर कुछ घंटे वही घिसी-पिटी बातें…
कभी अपनी असफलताओं का रोना रोता, कभी दुनिया की शिकायत करता, कभी किसी तीसरे की बुराई, तो कभी स्वरा के निजी निर्णयों पर सवाल-जवाब।
और यदि स्वरा व्यस्त होने की बात कह देती, तो तुरंत नया आरोप—
“तुम्हें अब पुराने लोग बोझ लगने लगे हैं न! याद करो, कितनी अच्छी दोस्ती थी हमारी! तुम्हें नहीं लगता, तुम्हारा नेचर बदल गया है?”
स्वरा अपना अगला-पिछला सब याद करती और सोचते-सोचते आधा दिन इसी सब में गुज़ार देती।
धीरे-धीरे उसने महसूस किया कि वह बातचीत नहीं कर रही, बल्कि सफ़ाई दे रही है। किससे कितनी बात की, क्यों की, किसी के साथ अच्छी क्यों बनी, किसी को बुरा क्यों कहा… सोशल मीडिया के पचड़े!
सफ़ाई… और सिर्फ़ सफ़ाई!
उसने महसूस किया कि अंशुल को उसके वर्तमान जीवन की उठापटक से कोई वास्ता नहीं है। वह तो बस जब-तब अपने मन का कचरा उड़ेलने के लिए उसे कॉल करता है।
अपना तनाव, अपनी पीड़ा, अपना ही फ्रस्ट्रेशन! केवल अपना… अपना! वह तो उसकी ज़िंदगी में कहीं थी ही नहीं। आखिर दोस्ती के नाम पर अनचाहे रिश्तों को ढोना कहाँ तक सही है?
एक दिन उसकी सहकर्मी मीरा ने पूछा, “इन दिनों बुझी-बुझी लगती हो तुम! एवरीथिंग इज़ ओके?”
स्वरा हँस पड़ी, “हाँ यार! काम बहुत है, शायद उसकी वजह से!”
मीरा ने कहा, “नहीं… काम की थकान अलग होती है, डियर! थोड़ा ध्यान रखो अपना!”
उस रात स्वरा ने अपना स्क्रीन टाइम देखा। चार घंटे सोशल मीडिया। दो घंटे ऐसे लोगों की चैट, जिनसे बात करके कभी अच्छा नहीं लगा।
उसे लगा मानो किसी ने उसकी ज़िंदगी के मीठे पलों की जेब से छह घंटे सर्ररर… से काट लिए।
कुछ दिनों बाद अंशुल का फिर संदेश आया—
“फ्री हो? कुछ ज़रूरी बात करनी है।”
उसने जवाब नहीं दिया।
कुछ देर बाद फोन आया, जो रिसीव नहीं किया गया।
फिर आया एक लंबा-चौड़ा संदेश…
“तुम खराब हो, तुम अभिमानी हो, बदल गई हो, सफलता के नशे में चूर हो, ज़्यादा फेमस हो गई हो…”
पढ़कर पहली बार स्वरा को ज़ोर की हँसी आई।
इन स्पैम लोगों को एक बार तवज्जो न दो, तो इनके अपनेपन का सारा आडंबर भरभराकर ध्वस्त हो जाता है।
सच तो यह है कि ऐसे लोगों को एक श्रोता चाहिए होता है, जिस पर वे अपना मानसिक कूड़ा उड़ेल सकें।
स्वरा ने ब्लॉक बटन दबा दिया, क्योंकि उसे किसी का कूड़ेदान नहीं बनना था।
मोबाइल में तो एक विकल्प होता है –Block।
जीवन में भी ऐसा कोई बटन होना चाहिए। जब लगे कि आप किसी के लिए डस्टबिन बनते जा रहे हैं, तो ऐसे लोगों से दूरी बना लीजिए।
धीरे-धीरे स्वरा ने अपने जीवन का एक नया नियम बना लिया—
जो हर मुलाक़ात के बाद भीतर तसल्ली छोड़ जाए, वह अपना।
जो हर बातचीत के बाद उदासी, अपराधबोध या बेचैनी छोड़ जाए, वह स्पैम।
उसने लोगों को बदलना बंद कर दिया। बस अपनी सूची बदल दी।
वैसे भी, “तुम बदल गई हो…” यह तो सुनना ही पड़ता था। तो वही सही! मिथ्या आरोपों को सार्थक कर देना चाहिए।
स्वरा ने महसूस किया कि उसके भीतर एक खाली, शांत-सी जगह बन गई है। हल्का लग रहा था।
मन भी घर की तरह होता है। ताज़ी हवा, नई रोशनी और स्वच्छ विचारों को स्थान देना हो, तो कबाड़ हटाना ही पड़ता है।

शुक्रिया सुरेश जी 🙏