
रश्मि ‘लहर’ लखनऊ
ऐसा नहीं है कि मैं
अनभिज्ञ हूँ युद्ध की आहट से,
अपरिचित हूँ युद्ध के परिणाम से,
मानव के बेबस संग्राम से।
मैं भी उद्वेलित हूँ
गोलियों की तड़तड़ाहट से,
नन्हे-सहमे भय की अकुलाहट से!
मुझे ज्ञात है कि
किसी भी पल रह जाएगी निश्चेष्ट
यह हलचल।
पर उससे पहले,
ओ प्रिय!
मैं कर लेना चाहती हूँ
सोलह शृंगार
तुम्हारे प्रेम-पगे असंख्य भावों से।
जी लेना चाहती हूँ
तुम्हारे नेह का
एक-एक क्षण।
छोड़कर
अपने मन का भय,
मैं खो जाना चाहती हूँ
समय की शांत, अनमोल
साँसों की छाँव में,
सुंदर नवजात
सपनों की बाँहों में,
इस विश्वास के साथ कि
अभी तक मैं जीवित हूँ।
ओ प्रिय!
मैं रोक देना चाहती हूँ
इस बर्बर हिंसा को
और जन्म लेते हुए देखना चाहती हूँ
कुदरत की कोख से
एक नए उजास भरे युग को,
एक नई प्रेरणा को,
एक नए साहस को,
जो शांति ले आए,
जो शांति बाँटे,
और
वह शांति
अमर हो जाए!

सादर धन्यवाद!